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आख़िरी साँस लेती एक कला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में सिनेमा एक जुनून की हद तक लोकप्रिय रहा है और ख़ासतौर से दक्षिण भारत में इस लोकप्रियता ने नए आयाम छुए हैं. इन्हीं आयामों में से एक रहा है सिनेमा के बड़े-बड़े पोस्टर हाथों से बनाना जो बहुत पसंद किए जाते रहे हैं. ये पोस्टर इतने बड़े हुआ करते थे कि उनके सामने ऊँची इमारतें और बड़े वाहन भी छोटे नज़र आने लगते थे. इन पोस्टरों से भी आगे बढ़कर कटआउट प्रचलन में आ गए और आमतौर पर अभिनेता और अभिनेत्रियों के कटआउटर हर जगह देखे जा सकते थे. लेकिन अब यह लोकप्रिय कला विलुप्त होती जा रही है क्योंकि कंप्यूटर तकनीक ने इसके वजूद को ही ख़तरे में डाल दिया है. वजह ये है कि हाथ से पोस्टर बनाने में ख़ासी मेहनत और हुनर की ज़रूरत होती थी लेकिन कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक ने इनकी जगह लेनी शूरू कर दी है क्योंकि उसमें मेहनत बहुत कम है और समय भी ज़्यादा नहीं लगता. चेन्नई के अश्विन राजगोपालन एक कला दीर्घा चलाते हैं और इस तरह के पोस्टर और कटआउट एकत्र करने में दिलचस्पी रखते हैं. वे ऐसे पोस्टर और कटआउट बनाने वाले विभिन्न कलाकारों को पिछले साल बर्लिन में हुई एक प्रदर्शनी में भी ले गए.
राजगोपालन कहते हैं कि चार साल पहले क़रीब 400 ऐसे कलाकार हुआ करते थे और वे व्यावसायिक एसोसिएशनों से भी जुड़े हुए थे. लेकिन अब चेन्नई में बड़े सिनेमा पोस्टर बनाने वाले छह बड़े स्टूडियो में से दो बंद हो चुके हैं और वे याद करते हुए बताते हैं कि बाक़ी चार स्टूडियो में दर्जन भर से ज़्यादा कलाकार नहीं बचे हैं. इनमें से ज़्यादातर के बच्चे अब कला विद्यालयों में जाने लगे हैं और उनकी ख़ास दिलचस्पी डिजिटल तकनीक सीखने में होती है. राजगोपालन का कहना था, "वे जानते हैं कि अब हाथ से पोस्टर और कटआउट बनाने में कुछ नहीं बचा है और इसका कोई भविष्य नहीं है." हुनर हाथ से पोस्टर और कटआउट बनाने वाले इन स्टूडियो में से हर एक में आमतौर पर दस से बारह कलाकार काम करते रहे हैं. फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले निर्माता निर्देशक इन स्टूडियो के फ़िल्म के कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों दे देते हैं. इन दृश्यों को एक सफ़ेद कपड़े पर उतार लिया जाता है और फिर उसी की मदद से बड़े-बड़े पोस्टर और कटआउट बनाए जाते हैं. एक सप्ताह में ये कलाकार इस तरह के 200 पोस्टर तक बना सकते हैं.
ये कलाकार अपनी सृजनात्मक और रचनात्मक क्षमता के लिए जाने जाते रहे हैं. ये कलाकार कपड़े या टिन की चादर पर रंगों का प्रयोग इस हुनर के साथ करते हैं कि लोगों की नज़रें बरबस ही उन पर आ टिकती हैं. प्रख्यात पेंटर और कला निर्देशक तोट्टा तरानी कहते हैं कि एकदम अदभुत कलाकार हैं. "उनका कला अनोखी छाप छोड़ने वाली है, वे किसी भी तस्वीर को बड़ा कर सकते हैं, किसी की भी नक़ल कर सकते हैं, सचमुच उनके हाथों में ग़ज़ब का हुनर है." जीविका लेकिन बहुत से कलाकार अब यह मानने लगे हैं कि यह कला अब उनकी आजीविका का सहारा नहीं रह गई है. वजह ये है कि डिजिटल तकनीक सस्ती और कम समय लगाने वाली है. डिजिटल तकनीक से एक वर्ग फुट की कोई तस्वीर बनाने में 25 रूपए का ख़र्च आता है जबकि इसी आकार का कोई पोस्टर हाथ से बनाने में कम से कम 200 रूपए की लागत आएगी.
इससे साफ़ है कि पेंटरों का पक्ष कमज़ोर हो जाता है. चेन्नई की एक पतली सी गली में रहने वाले दूसरी पीढ़ी के एक ऐसे ही पेंटर बाला बहुत मायूस हैं. "सिनेमा पोस्टर हाथ से बनाने के स्वर्णिम दिन अब बीते दिनों की बात है. अब कोई उम्मीद नहीं बची है." बाला ने पिछले साल 20 पोस्टर बनाए थे और उनमें ज़्यादातर नेताओं के थे. वैसे तो ऐसे पेंटरों की रोज़ी रोटी सिनेमा के पोस्टरों पर ही निर्भर होती है लेकिन चुनाव के दिनों में नेताओं के पोस्टर और कटआउट बनाने का काम भी मिल जाता है. बाला कहते हैं, "अब मुझे जो भी काम मिल जाता है, मुझे करना पड़ता है, इसमें मेरी मर्ज़ी नहीं चल सकती." बाला के एक भाई वेंकटेश ने कई साल पहले ही रंग और कूची को अलविदा करकर मोटर साइकिल सुधारने का काम सीख लिया और अब उसी से रोज़ी रोटी चला रहा है. |
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