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'वंदे मातरम् थोपा नहीं जा सकता' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत का मुसलमान इस देश की मिट्टी से बेपनाह मोहब्बत करता है लेकिन वंदे मातरम् को उन पर थोपा नहीं जा सकता. वंदे मातरम् का मतलब धरती की पूजा करने से है लेकिन इस्लाम में ख़ुदा के अलावा किसी और की पूजा की इजाज़त नहीं है. ऐसे में बेहतर है कि वंदे मातरम् को स्वैच्छिक रखा जाए. इसे जोर-ज़बर्दस्ती से लागू नहीं किया जा सकता. इसे मुसलमानों की देशभक्ति से भी जोड़ कर नहीं देखा जा सकता. हम अपनी देश से मोहब्बत करते हैं और वफ़ादार हैं और आगे भी मोहब्बत करते रहेंगे. यही इस्लाम भी कहता है. हमें वतन से वफ़ादारी का प्रमाणपत्र किसी से लेने की ज़रुरत नहीं है. हम कभी भी राष्ट्रगान का विरोध नहीं करते. हमें 'जन गण मन' गाने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन वंदे मातरम् उस हैसियत का नहीं है. इसे बेवजह मज़हबी मामला बना दिया गया है और इसे सियासी रंग दिया जा रहा है जो मुल्क़ के लिए ठीक नहीं है. मैं पूछता हूँ आख़िर अभी यूपीए सरकार को विवादास्पद सर्कुलर लाने की ज़रुरत ही क्या थी. दरअसल, पिछले 60 वर्षों से मुसलमानों को जज़्बाती मसलों में उलझाने की साजिश होती रही है. यह भी इसी का हिस्सा है और इसके लिए कॉंग्रेस पार्टी पूरी तरह ज़िम्मेदार है. मैं तो कहूँगा कि कॉंग्रेस और बीजेपी में एक तरह का क़रार है जिसके तहत दोनों एक दूसरे को राजनीति की रोटी पकाने का मौका देते रहते हैं. इस विवाद के बजाए सरकार को लोगों के रोज़गार और देश की तरक्की पर ध्यान देना चाहिए. (आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें वंदेमातरम को लेकर विवाद छिड़ा29 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'मुस्लिम समुदाय की शंकाएँ दूर करेंगे'21 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस आतंकवाद पर चर्चा करेंगे उलेमा17 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस सेना में मुसलमानों की गिनती पर हंगामा17 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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