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जटिल सांस्कृतिक-राजनीतिक विवाद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या वंदे मातरम् गाना हर भारतीय के लिए ज़रूरी है? क्या आपकी राष्ट्रभक्ति इससे सिद्ध होती है और क्या इसे न गाना संविधान का उल्लंघन है? विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल की सुनें, तो शायद है. अशोक सिंघल कहते हैं,"वंदे मातरम् का विरोध करना हमारे संविधान का विरोध करना है. इस गान का विरोध देश के राष्ट्रगीत का विरोध है. यह असंवैधानिक है और इसलिए ऐसे सब लोगों के ऊपर भारत सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए." दूसरी ओर, मुस्लिम नेतृत्व इसे ग़ैर इस्लामी बता रहा है और उसके तेवर भी गर्म हो रहे हैं. ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लमीन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं, "अगर वंदे मातरम् न गाना असंवैधानिक है तो आदालत क्यों न चला जाए?" "मैं वंदे मातरम् नहीं पढ़ना चाहता और न मैं पढूँगा. तो क्या मैं कोई क़ानूनी जुर्म कर रहा हूँ? क्या इंडियन पीनल कोड या सीआरपीसी के तहत मुझ पर कोई मुकदमा बन सकता है. अगर बन सकता है तो मैं उसे चैलेंज करता हूँ." "बीजेपी का ये कहना कि वंदे मातरम् नहीं पढ़ेंगे तो मुल्क छोड़कर चले जाइए. यह बीजेपी का मुल्क नहीं है. यह मुल्क हमारा है इस मुल्क के हम रहने वाले हैं. आज हिंदुस्तान में 14 करोड़ मुसलमान रह रहे हैं तो इसीलिए कि उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत को नहीं माना और कहा कि हम यहीं पर रहेंगे क्योंकि मुल्क हमारा है." वंदे मातरम् गीत के इतिहास पर पुस्तक लिखने वाले इतिहासकार सव्यसाची भट्टाचार्य कहते हैं, "जब हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों की शक्ति बढ़ी, तब ये गीत एक राष्ट्रीय गीत से सांप्रदायिक गीत के रंग में रंगा गया." समाजशास्त्री इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "इस्लाम एक ऐसी पोशाक है जो समय के अनुसार अलग-अलग अवसरों के लिए पहनी जा सकती है." "जब वंदे मातरम् कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गाया गया उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष मुसलमान थे. उसके बाद से लेकर हिंदू हों या मुसलमान, सब वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत की तरह से गाते रहे जैसे 'सारे जहाँ से अच्छा' गाते थे. 'सोचने का ढंग' हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य के संपादक तरुण विजय कहते हैं, "वंदे मातरम् भारत की प्राण-रेखा है. ये गंगा और हिमालय की तरह है. मुस्लिम हों या हिंदू, सबने वंदे मातरम् गाते-गाते फाँसी के फंदे चूमे हैं. इसको 'कम्युनलाइज़' (सांप्रदायिक रंग) कुछ मुस्लिम नेता कर रहे हैं." "इसका सांप्रदायिकरण करना तो बहुत बड़ी विडंबना होगी. ये 'एटिट्यूड' या सोचने के ढंग की बात है और इसका इलाज तो वे ख़ुद ही कर सकते हैं." इस गीत को हिंदू प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना, हिंदू महासभा जैसे संगठनों को इसे अपने नारे के रूप में लेना और फिर संविधान सभा के अंत में 1950 में इसका गाया जाना - ये सब भी 130 साल के इस गीत के सफ़र का हिस्सा हैं. आज फिर इस गीत का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है. असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं, "किसी पर दबाव डालना ग़लत है, ये कौन सा टेस्ट है कि आप पढ़ेंगे तो हिंदुस्तान के वफ़ादार हैं, नहीं पढ़ेंगे तो वफ़ादार नहीं है. हमें इन संघ परिवार वालों से वफादारी का सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत नहीं है." विवादों की झड़ी के बीच एक और विवाद यह शुरु हो गया है कि क्या असल में इस साल सितंबर में इस गीत के सौ साल मनाना ठीक है? कुछ इतिहासकारों के अनुसार इतिहास शायद ऐसी कोई तारीख नहीं देता. लेकिन आज के माहौल में इतिहास को भूलना और ऐतिहासिक घटनाओं और गीतों को अपने फ़ायदे के लिए आज के चश्मे से देखना ही शायद ऐसे विवादों की जड़ है. |
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