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वंदे मातरम् गाएँगे सरकारी महकमे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी शासित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने ऐलान किया है कि सभी सरकारी कार्यालयों में एक जुलाई से प्रत्येक माह एक दिन राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् का गायन होगा. राज्य सरकार द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि वंदे मातरम् के गायन की प्रक्रिया वरिष्ठ अधिकारियों के विचार-विमर्श से तय की जाएगी. विज्ञप्ति के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा है कि वंदे मातरम् के गायन से अधिकारियों में देश सेवा की भावना जागेगी तथा समय की पाबंदी सुनिश्चित होगी. शुक्रवार को भोपाल में राज्य मंत्रिमंडल की एक बैठक की शुरुआत भी राष्ट्रीयगीत से की गई. मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने कहा कि भविष्य में मंत्रिमंडल की बैठकों की शुरूआत वंदे मातरम् के गायन के साथ ही होगी. मध्यप्रदेश विधानसभा में विपक्ष की नेता जमुना देवी ने इस निर्णय को हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने की साज़िश बताया है. वो कहती हैं, “भाजपा सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के माध्यम से वंदे मातरम् की आड़ में आरएसएस के गीत “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि” की भावना को बढ़ाकर अल्पसंख्यक समुदाय में डर पैदा करना चाहती है और गुजरात के समान मध्यप्रदेश को भी हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने में लगी है.” उन्होंने पूछा कि पाँच लाख के इस सरकारी अमले के अलावा क्या बाबूलाल गौर राज्य के बाक़ी नागरिकों को राष्ट्रभक्त नहीं मानते? विवादित राष्ट्रगीत 19वीं सदी के दौरान बंगाली लेखक बंकिमचंद चटोपाध्याय द्वारा लिखित उपन्यास आनंद मठ में मौजूद यह गीत पूरी कहानी की मुस्लिम-विरोधी भावना के कारण विवादास्पद रहा है और इन्हीं कारणों से एक वर्ग के ज़ोर के बावजूद इसे राष्ट्रगान का दर्जा हासिल नहीं हो सका. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस विचार से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं ने इस गीत के गायन पर हमेशा ज़ोर दिया है. बल्कि उनका तो यह नारा भी रहा है कि “भारत में रहना है तो वंदे मातरम् कहना है.” इससे पहले केंद्र में भाजपा नेतृत्ववाली पिछली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार के शिक्षा मंत्री, मुरली मनोहर जोशी भी ने राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की एक बैठक की शुरूआत इससे और सरस्वती वंदना से करवाने की कोशिश की थी. हालांकि कई राज्यों के विरोध के कारण उन्हें इस निर्णय को वापस लेना पड़ा. मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के मंत्रिमंडल की बैठकों और कार्यालयों में वंदे मातरम् गाने के आदेश को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है. गौर बनाम उमा इसे मुख्यमंत्री द्वारा अपने आपको बेहतर हिंदूत्ववादी साबित करने की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखते हुए बुद्धिजीवी और प्रसिद्ध हिंदी कवि भागवत रावत कहते हैं, “बाबूलाल गौर की सत्ता को हमेशा उमा भारती से एक चुनौती रहती है, जो कि उग्र हिंदूवादी नेता मानी जाती है. इसीलिए बाबूलाल गौर अब अपने नेतृत्व के सामने यह साबित करना चाहते हैं कि वह भी पार्टी की विचारधारा और एजेंडे को भी पूर्व मुख्यमंत्री की तरह बेहतर तरीक़े से अमल में आ सकते हैं." रावत कहते हैं, "यहाँ बाबूलाल गौर की पृष्ठभूमि पर ग़ौर करना ज़रूरी है जिनके बारे में कभी यह भी अफ़वाह थी कि अगर दिग्विजय सिंह फिर से सरकार बनाते हैं तो वह उनके साथ चल जाएंगे.” राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के इशारे पर सरकार चलाने का आरोप सह रहे बाबूलाल गौर ने पिछले महीने राज्य के तीन हिंदू धार्मिक स्थलों ओरछा, मैहर और चित्रकूट को पवित्र नगरी घोषित किया. राज्य में भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने पिछले साल उज्जैन, अमरकंटक और महेश्वर को ऐसा दर्जा देने की घोषणा की थी. बाबूलाल गौर ने पिछले महीने से शासकीय बैठकों तथा आयोजनों में कोल्ड ड्रिंक्स के स्थान पर स्वदेशी पेयजलों के उपयोग का निर्देश भी दिया है. राजधानी भोपाल में एक सवाल अब यह हो रहा है कि कभी मज़दूर नेता समझे जाने वाले बाबूलाल गौर उग्र हिंदुत्ववादी नेता और विवादित बाबरी मस्जिद तुड़वाने का मुकदमा झेल रही उमा भारती से प्रतिस्पर्धा में किस हद तक जाएंगे. ख़ासतौर पर तब, जब उनके पार्टी के एक वरिष्ठ नेता, लालकृष्ण आडवाणी अपनी छवि उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बनाने की कोशिश में हैं. |
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