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गुरुवार, 31 अगस्त, 2006 को 09:29 GMT तक के समाचार
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'वंदे मातरम् का विरोध अलगाववाद का प्रमाण है'

मुख़्तार अब्बास नक़वी
नक़वी मानते हैं कि वंदेमातरम पर विवाद अलगाववादी मानसिकता से प्रेरित है.
वंदे मातरम् के मुद्दे पर पूरी बहस एक बात तो साफ़ करती है कि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता और वोटों की सौदागरी है और राष्ट्रभक्ति अलगाववाद और विघटन की ग़ुलाम बनती जा रही है.

वोटों के सौदागरों के आसपास ऐसी ताकतें धूम रही हैं और उनके सामने हमारी राजनीति छोटी पड़ती जा रही है.

मैं इस तर्क से 100 प्रतिशत सहमत हूँ कि वंदे मातरम् गाना राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र नहीं है लेकिन वंदे मातरम् का विरोध अलगाववाद का प्रमाणपत्र ज़रूर है.

यह गीत हमारी राष्ट्रीयता का प्रतीक है. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों के लिए यह गीत प्रेरणा का श्रोत था और आज भी राष्ट्रवादी विचार के लोग इससे एक प्रवाह महसूस करते हैं इसलिए इसे किसी धर्म विशेष के साथ जोड़ना अलगाववादी मानसिकता का प्रतीक है.

विरोध ग़लत

वंदे मातरम् का विरोध आज से नहीं हो रहा है. वर्ष 1936 में मोहम्मद अली जौहर ने वंदे मातरम् का विरोध शुरू किया था.

उन्होंने कहा था कि यह इस्लाम के विरुद्ध है और उनकी अलगाववादी मानसिकता के चलते वंदे मातरम् को खंडित कर दिया गया और कहा गया कि केवल चरण ही गाए जाएँगे.

 मैं इस तर्क से 100 प्रतिशत सहमत हूँ कि वंदे मातरम् गाना राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र नहीं है लेकिन वंदे मातरम् का विरोध अलगाववाद का प्रमाणपत्र ज़रूर है.

इस विरोध का समर्थन करने के बाद भी देश का विभाजन नहीं रोका जा सका. वो मानसिकता आज भी क़ायम है और उस मानसिकता के लोग आज भी सक्रिय हैं.

ऐसे में सवाल केवल गीत का ही नहीं है बल्कि उस मानसिकता का है जो इस देश को घुन की तरह खाए जा रही है.

यह तर्क ही बिल्कुल ग़लत है कि वंदे मातरम् इस्लाम के विरुद्ध है. हम किसी इस्लामिक देश में नहीं रह रहे और न ही मुसलमानों से यह कहा जा रहा है कि मस्जिद में नमाज़ के साथ वंदे मातरम् गाओ.

दुनिया में भारत ही एक अकेला देश है जहाँ राष्ट्रीय गीत के आंदोलन हो रहा हो और विरोध भी हो रहा हो.

भारत में यदि रहना है तो...

ऐसा कहना ग़लत है कि जिन मुट्ठी भर मोलवियों ने यह फ़तवा जारी किया है वो देशभर के मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं. इन मुट्ठी भर लोगों की मानसिकता देश के करोड़ों मुसलमानों की मानसिकता नहीं है इसलिए इसके विरोध को किसी समुदाय विशेष से जोड़ना उचित नहीं है.

दूसरी बात यह कि अगर धर्मनिरपेक्षता की बैसाखी पर चलकर इस तरह के गीत का विरोध होता है तो दूसरी ओर से भी तीख़ी प्रतिक्रिया आएगी.

मैं तो यह कहूँगा कि जिस तरह से इसका विरोध हो रहा है उसकी तुलना में जो प्रतिक्रिया आ रही है वो बहुत हल्की और कम है.

एक मुसलमान होने के साथ ही मुझे इस बात का गर्व है कि मेरे मन में वंदे मातरम् के प्रति सम्मान है और यह देश की आन-बान-शान से जुड़ा हुआ है.

पूरे देश के हरेक गाँव, शहर में इस गीत का गान भारतीय जनता पार्टी करेगी.

(पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

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