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वंदे मातरम् के पीछे सबकी अपनी-अपनी राजनीति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राष्ट्रीय आंदोलन की जान रहे 'वंदे मातरम्' की रचना का सौंवा वर्ष धूमधाम से मने, याद किया जाए, इसमें बहुत आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए. लेकिन जिस अर्जुन सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुसलमानों के लिए आरक्षण और शैक्षिक संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण जैसे विवादास्पद फ़ैसले किए हों, उनके इस वंदे मातरम् के अनिवार्य पाठ के आदेश को राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता. आज़ादी की लड़ाई के दौरान ही काँग्रेस ने वंदे मातरम् पर मुसलमानों की आपत्ति को जायज़ मान लिया था इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि अर्जुन सिंह विवाद से परिचित न हों. उसके बाद से यह राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रीय आंदोलन का नारा या गीत बनने की जगह संघ परिवार की सांप्रदायिक शरारत का प्रमुख सूत्रवाक्य बन गया था. संघ परिवार यह नारा लगाता ही रहा है कि 'हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम् कहना होगा.' आख़िर क्यों अब संघ परिवार का राष्ट्रीय आंदोलन से रिश्ता या उसके राष्ट्रवाद पर ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, पर अर्जुन सिंह क्यों उसके एजेंडे को लागू कराने की तरफ़ गए, यह विचार करने का मुद्दा है. और इस संदर्भ में उनके पहले उठाए कदमों को याद किया जा सकता है जो न संविधान सम्मत ठहरे न संयुक्त प्रगतिशील सरकार की नीतियों और साझा कार्यक्रम की मूल भावना से मेल खाते हैं. पर इतना कहने में हर्ज नहीं है कि जब सरकार महँगाई, किसानों की आत्महत्या, बाढ़ और सूखे जैसी गंभीर समस्याओं से घिरी हो, एक ख़ास विकास दर बनाए रखने की जद्दोजहद में लगी हो, तब सरकार के इतने वरिष्ठ सदस्य की ओर से रह-रहकर ऐसे विवादों को उठाना कहीं न कहीं सत्ता की राजनीति से जुड़ा है. अर्जुन सिंह जैसे लोग अब अपनी अंतिम पारी खेल रहे हैं और अनेक पर्यवेक्षक भी मानते हैं कि एक ग़ैर राजनीतिक और नए आदमी के नेतृत्व में काम करना उन्हें नहीं सुहाता. राजीव गाँधी और सोनिया गांधी के नेतृत्व पर जिस जमात ने सवाल उठाए थे उनमें अर्जुन सिंह अगुवा थे. फ़ायदा-नुकसान अर्जुन सिंह ने बहुत जल्दी ही वंदे मातरम् पर भी अपने आदेश को नरम किया. लेकिन उनकी यह पहल संघ परिवार और कुछ मुस्लिम संगठनों को अपनी-अपनी राजनीति करने का मसाला दे ही गई. असल में बीते काफ़ी समय से कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मसले पर संघ परिवार की चुनौती के बाद कई अजीबोग़रीब फ़ैसले करती, बदलती और पछताती रही है. बाबरी मस्जिद, शाहबानो केस से लेकर गुजरात में एक पूर्व भाजपाई शंकर सिंह वाघेला को नेतृत्व सौंपने जैसे कई फ़ैसले इसी क्रम में गिनवाए जा सकते हैं. आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण का झुनझुना पकड़ाना भी ऐसा ही मसला है. चूक चाहे राजीव गाँधी से हुई हो या अर्जुन सिंह से, इसका लाभ भाजपा को हुआ और नुकसान पूरे मुल्क और खुद कांग्रेस पार्टी को. दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भाजपा वंदे मातरम् पर पूरी वकालत शहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी से कराती रही है जबकि लालकृष्ण आडणवाणी वंदे मातरम् की अनिवार्यता के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं. यही वजह है कि इस विवाद में पूरे संघ परिवार और खुद भाजपा के अंदर की राजनीति को भी आसानी से देखा जा सकता है. मुसलमानों की तरफ़ से भले ही गिनती के लोगों और संस्थाओं ने वंदे मातरम् का विरोध किया हो, सारे मुसलमान इस विवाद से अचानक शक़ के घेरे में ला दिए गए हैं. अब राष्ट्र भक्ति का मामला हो या राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सेदारी का, मुसलमानों के योगदान या भूमिका पर कौन सवाल उठा सकता है. ऐसे में एक कांग्रेसी मंत्री का फ़ैसला मुसलमानों को शक के घेरे में ला दे, संघ परिवार को नया जीवन दे दे और ख़ुद अपनी सरकार तथा पार्टी के लिए संकट खड़ा कर दे, कांग्रेस के लिए इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है? और यह सब वंदे मातरम् के साथ अपनाए जाने के सौवें साल में हो, इससे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात कुछ और नहीं हो सकती. |
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