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मेला खीरभवानी में श्रद्धालुओं का ताँता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीनगर से 28 किलोमीटर दूर खीरभवानी के मंदिर को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक कहा जा सकता है. इस वर्ष भी यहाँ हज़ारों की संख्या में लोग देवी के दर्शन के लिए उपस्थित हुए हैं. इनमें कई लोग जम्मू, दिल्ली, जयपुर और अन्य शहरों से आए हैं जहाँ वे 16 वर्ष पूर्व घाटी छोड़ चले जाने के बाद से रह रहे हैं. इनमें महिलाएँ भी हैं और बच्चे भी. हाथों में थालियाँ लिए हुए जिन पर दीपक, फूल और मोमबत्तियाँ सजाए हुए हैं. ये लोग माता खीरभवानी की मूर्ति को प्रसाद चढ़ा रहे हैं. यह मूर्ति एक तलाब के बीच स्थापित है. इस तलाब के बारे में मशहूर है कि इस का रंग बदलता है जिससे आने वाली परिस्थितियों का संकेत मिलता है. 75 वर्षीय जवाहर लाल मंदिर के एक कोने में बैठे हैं. वे कहते हैं कि इस तलाब के आसपास पानी कम हो ज़्यादा. तालाब का पानी न कभी बढ़ता है और न कभी घटता है. उन्होंने बताया, "मैंने गत 16 वर्षों से इस तालाब के बदलते रंग देखें है. कभी लाल, कभी काला, कभी गुलाबी और कभी मौंगा जैसा भी हुआ है." कई पंडितों का कहना है कि 16 वर्ष पूर्व तालाब का रंग काला हुआ था जो बुरे हालात का संकेत था. पलायन ध्यान रहे 16 वर्ष पूर्व ही कश्मीर में पृथकतावादी हिंसा शुरू हुई जिसमें अब तक लगभग 50 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं और जिसके कारण कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से पलायन करना पड़ा. जवाहरलाल ने मुझे बताया कि गत पाँच चार वर्षों से तालाब में पानी का रंग ठीक हो गया है जो अच्छे दिनों का संकेत देता है. लेकिन तालाब का पानी जो भी संकेत दे रहा हो इस वर्ष अपेक्षा से बहुत कम संख्या में पंडित लोग खीरभवानी के दर्शन करने आए. राधाकृष्ण भट कहते हैं, "पिछले साल तो बड़े लोग आए. इस साल तो उससे दस गुना लोग आने थे लेकिन हालात ख़राब हो गए." वे कहते हैं कि 90 प्रतिशत लोगों ने अंतिम समय पर अपनी बुकिंग रद्द कर दी. इससे एक बात स्पष्ट होती है कि कश्मीरी पंडितों ने अभी घाटी लौटने का मन नहीं बनाया है. सरकार ने मंदिर के बाहर सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए हैं. मंदिर के मुख्य द्वार में दाखिल होने से पहले सेना तथा पुलिस के जवान हर व्यक्ति की तलाशी लेते हैं. मेला खीरभवानी की एक विशेषता यह है कि यहाँ जो प्रसाद चढ़ाया जाता है वह स्थानीय मुसलमान उपलब्ध कराते हैं जिन्होंने मंदिर के बाहर दुकानें सजाई हैं. इनमें एक फारूख अहमद भी हैं. उन्होंने बताया, "जबसे पंडित यहाँ से भाग गए हैं हमने सेवा का ज़िम्मा अपने हाथ में ले लिया है. हम यहाँ प्रसाद बेचते हैं. हम मंदिर के सभी काम करते हैं-जैसे पेड़ लगाना और सफाई करना." परंपरा अब यह भी परंपरा बन गई है कि मेला खीरभवानी के अवसर पर मंदिर के बाहर अन्य मुसलमानों की भी भीड़ लगती है. इनमें अधिकांश सरकारी कर्मचारी होते हैं जो अपने पंडित भाइयों को बधाई देने और कुछ सुविधाएँ उपलब्ध कराने आए थे.
मुख्यमंत्री, मंत्री और वरिष्ठ पृथकतावादी नेता भी पंडित भाइयों का स्वागत करने मंदिर मे आते हैं. जो पृथकतावादी नेता स्वागत करने मंदिर आए थे उनमें शाब्बीर शाह भी थे. मंदिर में दर्शन करने आए लोगों में 12 वर्षीय अंतरा भी है. उनका जन्म जम्मू में हुआ. लेकिन उनके माता-पिता उत्तरी कश्मीर के हाजिन क्षेत्र से संबंध रखते हैं. अंतरा को कश्मीर बहुत अच्छा लगता है. वे कहती हैं कि यहाँ के मंदिर और पर्यटन केंद्र सुंदर हैं. लेकिन इससे भी सुंदर हाजिन में उनके माता-पिता के रिश्तेदार है. वे कहती हैं, "जब मैं अपने माता-पिता के रिश्तेदारों के यहाँ जाती हूँ तो वे बहुत ख़ुश होते हैं. वो हमे हर चीज़ उपलब्ध कराते हैं." बाद में पता चला कि वे मुसलमान पड़ोसियों को ही रिश्तेदार कहती हैं. |
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