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रामलाल मंदिर छोड़ने को तैयार नहीं हैं
पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत की राजधानी पेशावर के छावनी केंटोनमेंट इलाक़े में एक मंदिर है जिस पर सालों से सेना की नज़र लगी हुई है और सेना उस जगह को ख़ाली कराकर वहाँ एक बहुमंज़िला व्यवसायिक परिसर बनाना चाहती है. अब सैनिक प्रशासन ने क़रीब डेढ़ सौ साल पुराने इस मंदिर और उसके आसपास बसी बस्ती को ख़ाली कराने के लिए एक बार फिर नोटिस दिया है. नोटिस में इलाक़ा ख़ाली करने के लिए 31 अक्तूबर तक की समय सीमा दी गई थी जिसे बाद में रमज़ान का महीना ख़त्म होने तक बढ़ा दिया गया है. पेशावर की कालीबाड़ी नाम की इस बस्ती की पिछले कुछ वर्षों में व्यावसायिक अहमियत बढ़ी है इसलिए फ़ौजी प्रशासन इस जगह बहुमंज़िला व्यावसायिक बाज़ार परिसर बनाना चाहता है. ज़ाहिर है ऐसा करने के लिए मौजूदा घरों को गिराना होगा. लेकिन वहाँ के रहने वाले इसके लिए तैयार नहीं हैं. पिछले पंद्रह साल से इसके लिए कोशिश की जा रही है मगर लोगों को मनाना टेढ़ी खीर साबित हो रही है. उसकी एक वजह है कि वहाँ मंदिर होने से मामला कुछ संवेदनशील हो गया है. वाल्मीकि मंदिर के पुजारी रामलाल हैं पिछले क़रीब पैंतीस साल से इस मंदिर की देखभाल कर रहे हैं.
पेशावर के सदर इलाक़े की कालीबाड़ी के इस मंदिर में रामलाल का ख़ानदान पिछली क़रीब डेढ़ सदी से रहता आया है और वही पूजा-पाठ करते हैं. इस मंदिर के इर्द-गिर्द क़रीब सत्तर मकान हैं जिनके मालिकों को मकान ख़ाली करने के नोटिस दिए गए हैं. पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत की राजधानी पेशावर के बीचों-बीच स्थित छावनी के इस इलाक़े ने कारोबार के लिहाज़ से काफ़ी अहमियत हासिल कर ली है और आसपास कई इमारतें पहले से ही बन चुकी हैं. अहमियत बढ़ी कालीबाड़ी का इलाक़ा भी मोटर मैकेनिकों की दुकानों की वजह से काफ़ी व्यस्त रहता है और दिन में यहाँ तिल धरने की भी जगह नहीं मिलती. छावनी प्रशासन का कहना है कि यह इलाक़ा केंटोनमेंट बोर्ड की संपत्ति है और वह इसे ख़ाली कराने का अधिकार रखता है. दूसरी तरफ़ वाल्मीकि मंदिर के पुजारी रामलाल कहते हैं कि यह संपत्ति अल्पसंख्यकों की है. रामलाल इस इलाक़े में हिंदू बिरादरी के नेता भी हैं. रामलाल बताते हैं, "1861 में मेहरचंद खन्ना, सेठ सलवान, सेठ ईश्वर दास और सेठ शंकर दास चार हिंदू सेठ थे जो इस वक़्त क़रीब आधे कैंट इलाक़े के मालिक थे और काली बस्ती उन्होंने अपने कर्मचारियों के लिए बनाई थी और तभी से ये सारे लोग यहाँ रह रहे हैं."
रामलाल का कहना था कि अगर यह इलाक़ा छावनी की मिल्कियत होती तो फ़ौजी प्रशासन उन्हें कब का बेदख़ल कर चुका होता. काली बाड़ी में मुख्यरूप से हिंदुओं के वाल्मीकि समुदाय के लोग रहते हैं और उनका पूजा-पाठ इसी मंदिर में होता है. हालाँकि इमारत के तौर पर यह मंदिर बहुत क़ीमती नहीं है लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से और यहाँ के लोगों की नज़र में यह मंदिर बेशक़ीमती है. वहाँ रहने वाली एक हिंदू महिला देवी दास का कहना था, "हमारी सारी उम्र इसी घर या मंदिर में गुज़री है, अब यह हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है." रामलाल इस जगह के बदले कहीं और जगह लेने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अगर उन्हें वहीं प्रस्तावित बहुमंज़िला परिसर में जगह दी जाए तो वे बस्ती ख़ाली करने को तैयार नज़र आते हैं. |
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