|
जिनके बिना पूजा नहीं होती वे ही अछूत हैं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ढोल पर उनकी थाप के बिना भगवान शिव की पूजा-अर्चना शुरू नहीं हो सकती. लेकिन खुद उनको मंदिर में प्रवेश या दर्शन का कोई अधिकार नहीं है. यह लोग जनजाति रूईदास तबके के हैं. शिवलिंग की पूजा के समय उनको मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं है इसलिए वे लोग मंदिर से दूर रह कर ही ढोल बजाते हैं. यह स्थिति है बीते 28 वर्षों से सत्ता मे बैठे वामपंथियों के राज्य पश्चिम बंगाल में. राज्य के बर्दवान जिले के दो सौ साल पुराने शिव मंदिर में उनको अछूत माना जाता है. इस प्राचीन परंपरा के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता क्योंकि ऐसा करने पर गांव से निकाले जाने का खतरा है. ऐसे एक ढोलवादक मदन बताते हैं कि "कुछ साल पहले हमने तय किया था कि जब मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं है तो हम ढोल भी नहीं बजाएंगे लेकिन गांव के सवर्णों ने हमें गांव से निकालने की धमकी दी. उसके बाद हमने मजबूरन फिर ढोल बजाना शुरू किया." इसी तबके के एक बुजुर्ग रामगोपाल कहते हैं कि "वर्षों से हमारे पुरखे इस मंदिर में ढोल बजाते रहे हैं. लेकिन हम अब तक मंदिर में प्रवेश नहीं कर सके हैं." वे सवाल करते हैं कि "यह विडंबना नहीं तो क्या है?" इस पुराने मंदिर में सात दिनों तक चलने वाली शिव की पूजा के दौरान लगभग तीन सौ मन लकड़ियां जलाई जाती हैं और सैकड़ों लोग साधु बनते हैं. इस साल भी चार सौ लोग साधु बने हैं. सदियों पुरानी मान्यता है कि इस पूजा के दौरान बने साधुओं की ओर से हवन की जलती हुई लकड़ियां जितनी दूर फेंकी जाती हैं गांव पर विपत्ति का खतरा भी उतना ही कम होता है. इस सात दिन के उत्सव समिति के सदस्य उदय आशा बताते हैं कि ‘पूजा के दौरान काफी तादाद में पटाखे छोड़े जाते हैं.’ इन पटाखों की रोशनी आस-पास के गाँवों को भी रोशन कर देती है. लेकिन गांव के ही रूईदास तबके के लोगों की जिंदगी का अंधेरा अब तक दूर नहीं हो सका है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||