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बद्रीनाथ मंदिर में दक्षिण के पुजारी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बद्रीनाथ धाम में पुजारी केरल के ब्राह्मण होते हैं. मंदिर में पूजा करने का अधिकार सिर्फ़ इन्हें ही होता है. हिमालय के मंदिर में सुदूर दक्षिण के पुजारी को नियुक्त करने की ये परंपरा शंकराचार्य ने डाली थी जो आज तक अबाध रूप से चली आ रही है. बर्फीली चोटियों पर हिंदी और गढ़वाली बोली में बात करते गोरे पहाड़ी चेहरों के बीच बद्रीनाथ धाम में जब टूटी-फूटी हिंदी में बात करते माथे पर तिलक लगाए एक दक्षिण भारतीय पुरोहित से सामना होता है तो क्षणभर के लिए कोई भी ठिठक सकता है. कोई भी सोच सकता है कि समुद्र तट के किसी इलाक़े से आए इस ब्राह्मण का आखिर यहां क्या काम. लेकिन सच तो ये है कि भगवान बद्रीनारायण की पूजा अर्चना के मुख्य अधिकारी सिर्फ़ केरल के ये नंबूदरीपाद ब्राह्मण ही हैं. इन्हें शंकराचार्य का वंशज माना जाता है और ये रावल कहलाते हैं. आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में जिन चार धामों की स्थापना की थी बद्रीनाथ उनमें से एक हैं. शंकराचार्य खुद केरल के कालडी गांव के थे जहां से उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ पूरे देश में वैदिक धर्म के उत्थान और प्रचार का अलख जगाया. परंपरा बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष नंदकिशोर नौटियाल कहते हैं,'' हिंदू धर्म के पुनरूत्थान और हिंदू धर्मावलंबियों को एकजुट करने के लिए शंकराचार्य ने ये व्यवस्था की थी कि उत्तर भारत के मंदिर में दक्षिण का पुजारी हो और दक्षिण भारत के मंदिर में उत्तर का हो, जैसे कि रामेश्वरम में उत्तर के ब्राह्मण ही नियुक्त होते हैं.'' वर्त्तमान रावल बद्रप्रसाद नंबूदरी को इस बात का गर्व है कि वो सैकड़ों साल पुरानी इस परंपरा के वाहक हैं,'' ये सहिष्णुता और सदाशयता का प्रतीक है.मुझे विश्वास है कि जब तक वैदिक धर्म रहेगा ये वयवस्था भी बनी रहेगी.'' केरल के नंबूदरीपाद ब्राह्मणों में से रावल का चयन बद्रीनाथ मंदिर समिति ही करती है. इनकी न्यूनतम योग्यता ये है कि इन्हें वहां के वेद-वेदांग विद्यालय का स्नातक और कम से कम शास्त्री की उपाधि होने के साथ ब्रह्मचारी भी होना चाहिए. नये रावल की नियुक्ति में त्रावणकोर के राजा की सहमति भी ली जाती है. साल के छह महीने जब भारी हिमपात के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं तब रावल वापस अपने घर केरल चले जाते हैं और कपाट खुलने की तिथि आते ही वापस बद्रीनाथ आ जाते हैं. बद्रीनाथ में पूजा जहां केरल के ये रावल करते हैं वहीं स्थानीय डिमरी समुदाय के ब्राह्मण इनके सहायक होते हैं. पंडित बच्चीराम डिमरी बताते हैं,'' दरअसल डिमरी भी मूल रूप से दक्षिण भारतीय ही हैं जो शंकराचार्य के साथ ही सहायक अर्चक के तौर पर आए थे लेकिन यहां से वापस नहीं गये और कर्णप्रयाग के पास डिम्मर गांव में रहने लगे इसलिए डिमरी कहलाए. बद्रीनाथ में भोग बनाने का अधिकार सिर्फ़ इन डिमरी पंडितों को ही होता है.'' लगभग 1200 साल पुराना बद्रीनारायण का मंदिर कई बार उजड़ा और कई बार बना लेकिन इस परंपरा पर आज तक आंच नहीं आई है. न ही कभी स्थानीय पुरोहितों से इसे चुनौती मिली. बद्रीनाथ में वेदपाठी ब्राह्मण भुवनचंद नौटियाल कहते हैं,'' पहाड़ में रावल को लोग भगवान की तरह पूजते हैं. उन्हें पार्वती का रूप भी माना जाता है.'' इस मान्यता की वजह से ही बद्रीनाथ में एक अनोखा धार्मिक संस्कार भी होता है.जिस दिन कपाट खुलते हैं उस दिन रावल साड़ी पहन पार्वती का श्रृंगार करके गर्भगृह में प्रवेश करते हैं. हालांकि ये अनुष्ठान सभी नहीं देख सकते हैं. |
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