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पहाड़ों पर कचरा रोकने की कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पर्वतारोहियों को अब कचरे का हिसाब भी देना होगा. पर्वतारोहण अभियानों के दौरान हिमालय की चोटियों पर पॉलिथीन,केन और प्लास्टिक के अन्य सामान के बढ़ते अंबार और प्रदूषण को रोकने के लिये उत्तरांचल में पर्वतारोहण की नई नीति बनाई गई है. इसके तहत अगर कोई पर्वतारोही अपने साथ लिये गये सामान को पहाड़ पर छोड़कर आता है तो उसे जुर्माना देना होगा. सिक्किम के बाद उत्तरांचल ऐसा दूसरा राज्य है जहाँ पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पर्वतारोहण को व्यवस्थित रूप देने के लिये नीति बनाई गई है. हर साल बरसात का मौसम खत्म होते ही गढ़वाल हिमालय की चोटियाँ पर्वतारोहियों को लुभाने लगती हैं. दुनिया भर से सैकड़ों की तादाद में पर्वतारोही नंदादेवी, सतोपंथ, द्रोणगिरी और पंचाचूली जैसी चोटियों की ओर रूख करने लगते हैं लेकिन जब वो लौटते हैं तो जाने अनजाने हिमालय की नाज़ुक पारिस्थितिकी का काफी नुकसान भी कर जाते हैं. अब तक ये एवरेस्ट के बारे में ही सुनने को मिलता था कि वहाँ पर्वतारोही कई-कई मीट्रिक टन कचरा छोड़कर आ जाते हैं लेकिन दूसरे शिखरों का भी यही हाल है. हाल ही में उत्तरांचल वन विभाग और स्थानीय लोगों ने मिलकर जब नंदादेवी के रास्तों की सफाई की तो वहाँ से बोतलें, केन, जूते-चप्पल, कपड़े आदि बोरों में भरकर लाए गए जिनका वज़न साठ टन था. लेकिन शायद अब ऐसा नहीं हो हो सकेगा. उत्तरांचल के चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डेन श्रीकांत चंदोला बताते हैं, "हमने हर पीक के रास्ते में एक एक्सपेडीशन चेकपोस्ट बनाया है जहाँ हर पर्वतारोही को एक-एक सामान का ब्यौरा देना होगा और लौटते समय सबको वापस लाना होगा वर्ना उनपर जुर्माना लगाया जाएगा. उन्हें रास्तों की परमिट लेनी होगी और उनसे एक पर्यावरण शुल्क भी वसूल किया जाएगा." व्यावहारिकता का सवाल मगर पर्यावरणवादियों का मानना है कि ये व्यवहारिक नहीं है.
हिमालयी क्षेत्रों में सँरक्षण का काम कर रही सँस्था हेस्को के अध्यक्ष डॉ. अनिल जोशी कहते है, "आप इसे किस तरह से लागू कर पाएँगे, कोई सामान छुपा सकता है, बचा सकता है, ऐसे चेकपोस्ट बनाकर तो ग़लत चीज़ों को ही बढ़ावा मिलेगा." उनका सुझाव है, "कचरा तो आएगा ही लेकिन हम उसे कचरे की तरह ही क्यों देखें, आज हमारे पास तकनीक है रीसाइक्लिंग प्लांट लगाए जा सकते हैं, उसकी प्रोसेसिंग कर उपयोग किया जा सकता है." उत्तराँचल में उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे इलाकों में तिरासी प्रमुख चोटियाँ पर्वतारोहण के लिये खुली हैं. नई नीति में कुछ रास्तों और चोटियों पर पाबंदी रखी गई है. हर महीने जानेवाले पर्वतारोही और अभियान दलों दोनों की ही संख्या सीमित कर दी गई है,चोटी की ऊँचाई के अनुसार पीक फीस यानी पर्वतारोहण शुल्क पाँच से दस हज्ञार बढ़ा दिया गया है और ईंधन के लिये लकड़ी के इस्तेमाल पर पाबँदी लगा दी गई है. हांलाकि ये नीति भारतीय पर्वतारोहण सँस्थान, दिल्ली और नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ मांउटेनियरिंग, उत्तरकाशी के सहयोग से बनी है लेकिन पर्वतारोहियों की नज़र से देखें तो ये फैसले इकतरफा हैं. ऐवरेस्ट अभियान दल की सदस्य रह चुकीं उत्तरकाशी की हिमवंती बिष्ट पर्यावरण के लिहाज से तो इसका स्वागत करती हैं लेकिन उनका मानना है कि इससे पर्वतारोही उत्तरांचल आने से कतराने लगेंगे, वे कहती हैं, "सिर्फ रोक ही रोक लगा दी गई है और शुल्क भी बढ़ा दिया गया है. विदेशियों से तो ठीक है लेकिन भारतीय पर्वतारोही इतना कैसे दे पाएँगे. ये तो ठीक है कि कोई यहाँ गंदगी फैलाकर न जाए लेकिन कैपों में कुछ सुविधाएँ देने के बारे में भी तो सोचा जाना चाहिये था." |
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