BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 30 जून, 2004 को 20:41 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
पानी में घुले ज़हर का कहर

पानी का संकट है
दक्षिण एशिया में शुद्ध पानी की परेशानी है
विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर के ताज़ा अंक में एक शोध प्रकाशित हुआ है जो पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में पानी की भीषण समस्या को समझने और सुलझाने में काफ़ी मदद कर सकता है.

मैनचेस्टर विश्विद्यालय के वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ज़मीन के नीचे के बैक्टीरिया खनिजों को अवशोषित कर आर्सेनिक नाम का ज़हर छोड़ते हैं.

पीने के पानी में आर्सेनिक का होना त्वचा के कैंसर जैसे जानलेवा रोग के अलावा और भी कई बीमारियों का कारण बनता है.

आर्सेनिक का रहस्य

1990 के दशक की शुरूआत में बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल के दस लाख से ज़्यादा कुओं को आर्सेनिक से दूषित पाया गया और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उसे मानव इतिहास में विषाक्त पानी की सबसे बड़ी घटना माना था.

कोलकता के जादवपुर विश्विद्यालय में पर्यावरण विभाग के डॉक्टर दीपांकर चक्रवर्ती ने इस समस्या और उसके कारणों पर कई वर्षों तक शोध किया है.

उनका कहना है, “पिछले 50 सालों से, जब से मनुष्य ने ज़मीन के पानी का प्रयोग किया, तभी से आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियाँ लोगों को परेशान करने लगी हैं.”

पानी मिलना दूभर
किल्लत के साथ ख़तरनाक भी है पानी

मैनचेस्टर विश्विद्यालय में इसी विषय पर चल रहे शोध में लगी फ़रज़ाना इस्लाम का कहना है कि बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में यह एक बड़ी समस्या है.

“मेरे देश, बांग्लादेश में, 30 लाख से ज़्यादा ट्यूबवेलों में ज़हरीला आर्सेनिक है. गाँव में रहने वाले लोग इसी पानी को पीते हैं और उन्हें विभिन्न तरह की बीमारियाँ हो रही हैं.”

“और हमें अब भी यह ठीक से नहीं पता कि इसे नियंत्रित कैसे किया जाए.”

नया शोध

नेचर पत्रिका में छपे शोध पत्र को फ़रज़ाना इस्लाम के साथ लिखा है जोनाथन लॉयड ने.

जोनाथन लॉयड का कहना है कि इस बारे में बहुत से सिद्धांत दिए गए हैं लेकिन उन्होंने ध्यान केंद्रित किया ज़मीन के नीचे मिलने वाले बैक्टीरिया पर, जो हवा और रौशनी के बग़ैर रहते हैं.

आर्सेनिक कहाँ से
 हमने प्रयोगशाला में पाया कि हवा के बग़ैर और कार्बन की मौजूदगी में जो बैक्टिरिया ज़मीन के नीचे के लोहे को खाते हैं, वो पानी में आर्सेनिक छोड़ते हैं.
जोनाथन लॉयड

जोनाथन लॉयड ने कहा, “यह बैक्टीरिया अपनी उर्जा के लिए ज़मीन के भीतर मौजूद खनिजों को अवशोषित करते हैं.

"हमने प्रयोगशाला में पाया कि हवा के बग़ैर और कार्बन की मौजूदगी में जो बैक्टिरिया ज़मीन के नीचे के लोहे को खाते हैं, वो पानी में आर्सेनिक छोड़ते हैं.”

लेकिन डॉक्टर चक्रवर्ती कहते हैं कि यह भी कई सिद्धांतों में से एक है, आर्सेनिक के पानी में पहुँचने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और अभी इस पर किसी सही निष्कर्ष तक पहुँचने में और समय लगेगा.

पानी की क़ीमत

डॉक्टर चक्रवर्ती यह भी कहते हैं कि ज़मीन के अंदर का पानी इस्तेमाल करना ही मानव की भूल थी.

“पूरी हरित क्रांति ज़मीन के नीचे के पानी पर ही आधारित थी लेकिन आज हम नतीजा देख रहे हैं कि कितने लोग आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियों से परेशान हैं.”

डॉक्टर चक्रवर्ती का मानना है कि पहले पानी के सभी अन्य स्त्रोतों का प्रयोग किया जाना चाहिए, वर्षा के जल का भरपूर प्रयोग हो और हर बूँद को सोच-समझ कर ख़र्च किया जाए.

पानी से आर्सेनिक को निकालने के लिए पानी को साफ़ करने के सयंत्र प्रयोग में लाए जा सकते हैं लेकिन कई बार ऐसे उपाय काफ़ी महँगे होते या फिर गाँवों में रहने वालों के हिसाब से जटिल.

और कई जगह पानी के स्त्रोत इस्तेमाल करना इसलिए संभव नहीं होता क्योंकि और कोई विकल्प मौजूद नहीं होते.

इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>