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पनचक्की से निकली नई रोशनी
अँधेरे से उजियारे की ओर गाँव-गाँव में बिजली पहुँचाने का सरकारी वादा भले ही पूरा नहीं हो पाया हो लेकिन उत्तराँचल के कुछ गाँवों के लोगों ने अपने दम पर बिजली पैदा कर मिसाल क़ायम की है. चमोली, देहरादून और रुद्रप्रयाग के इन गाँवों में परंपरागत पनचक्की पर टर्बाइन लगा कर पाँच किलोवाट तक बिजली पैदा की जा रही है. 32 साल के रामगोपाल के बच्चों को अब लालटेन की रौशनी में नहीं पढ़ना पड़ता बल्कि अब उनके घर पर 24 घंटे बिजली रहती है. देहरादून से ऋषिकेष के रास्ते पर लच्छीवाला गाँव में रहने वाले रामगोपाल ने जब से अपने परदादा के ज़माने की पनचक्की को आधुनिक तकनीक से जोड़ा है उनकी तो मानो दुनिया ही बदल गई है. वे कहते हैं, "पहले तो मुश्किल से एक घंटे में दस किलो अनाज पीसा जाता था लेकिन अब पाँच किलोवाट का अल्टरनेटर लग गया है जिससे एक घंटे में पचास किलो तक अनाज पिस जाता है." "इसके अलावा पाँच बल्ब जलते हैं, टेलीविज़न चलता है और फ्रिज भी." नया दौर कुछ ऐसी ही कहानी रुद्रप्रयाग के जखनियाल गाँव के चालीस परिवारों की भी है. पनचक्की से पैदा हो रही बिजली से ये लोग एक-एक बल्ब दस रुपए महीना देकर जलाते हैं.
यहाँ के सत्ते सिंह बुटेला जैसे निवासियों के लिए घरात या पनचक्की से बिजली पैदा होना किसी चमत्कार से कम नहीं है. बुटेला बताते हैं, "इस गाँव में आज़ादी के बाद से कभी बिजली नहीं पहुँची लेकिन अब देखिए कैसे जगमग करता है यह गाँव." उनके अनुसार यह पहाड़ के लिए मॉडल बन गया है. पहले पनचक्की सिर्फ़ अनाज पीसती थी और उससे तिलहन की पिराई होती थी. रुद्रप्रयाग, चमोली और देहरादून के इन लगभग 150 गाँवों में परंपरा और तकनीक का बेजोड़ संगम नज़र आता है और इस विद्युत क्रांति का श्रेय जाता है हिमालय पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संस्थान यानी हेस्को को. यह संगठन गाँवों के लोगों को परंपरागत घरातों यानी पनचक्कियों का तकनीकी विकास करने में मदद कर रहा है. वाटर मिल या पनचक्की को स्थानीय बोली में घरात कहा जाता है. पनचक्की पहाड़ी क्षेत्र का सबसे पहला ऐसा उद्योग माना जाता है जिसमें किसी पहाड़ी झरने या नदी का पानी तेज़ गति से चक्की पर गिरता है. इस पनचक्की में एक्सल की जगह बॉल बियरिंग लगाने से इसकी क्षमता सत्तर गुना बढ़ जाती है और छोटा टर्बाइन और अल्टरनेटर लगाकर यह एक छोटी पनबिजली इकाई बन जाती है. इसमें क़रीब 60-70 हज़ार रुपए का ख़र्च आता है. हेस्को के निदेशक डॉक्टर अनिल जोशी कहते हैं, "उत्तराँचल ही नहीं, पूरे हिमालय क्षेत्र में कुल पाँच लाख घरात हैं. "इनसे क़रीब 2500 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो सकता है और नेशनल पॉवर ग्रिड में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. डॉक्टर जोशी कहते हैं कि सरकार जहाँ नदियों को जोड़ने की महायोजना में करोड़ों रुपए ख़र्च करने पर विचार कर रही है वहीं योजना निर्माताओं को इन पनचक्कियों की भी सुध लेनी चाहिए. बिजली पैदा होने के साथ-साथ इन घरातों से पहाड़ी क्षेत्र में रोज़गार के अवसर भी बढ़ रहे हैं. यही नहीं घरातों से जुड़े लोगों ने एक राष्ट्रीय एसोसिएशन भी बनाई है और इन्हें लघु उद्योग का दर्जा देने की माँग की जा रही है. |
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