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गुरुवार, 30 अक्तूबर, 2003 को 06:21 GMT तक के समाचार
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गढ़वाली जागर गाते हैं विलियम सैक्स
अमरीका निवासी प्रोफ़ेसर विलियम सैक्स
अमरीका निवासी प्रोफ़ेसर विलियम सैक्स ने बनारस हिंदू विश्विविद्यालय से हिंदी में एमए किया

देहरादून से शालिनी जोशी

प्रोफ़ेसर विलियम सैक्स उर्फ़ बद्री प्रसाद नौटियाल वैसे तो जर्मनी की हिडेलबर्ग युनिवर्सिटी के दक्षिण एशियाई संस्थान में एंथ्रोपोलॉजी विभाग के अध्यक्ष हैं.

लेकिन पहाड़ की संस्कृति से उनका इतना गहरा लगाव है कि उनको जागर नंदा रज्जत और पाँडव जैसी लोक परंपराओं में महारथ हासिल है.

रिचुअल हीलिंग पर काम कर रहे प्रोफ़ेसर सैक्स का कहना है कि इन परंपराओं में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का राज़ छिपा है.

पहाड़ी वेशभूषा में जब प्रो. विलियम सैक्स गढ़वाली बोली में धाराप्रवाह जागर सुनाते हैं तो लगता है सुदूर पहाड़ी गाँव से आया कोई निपुण लोकगायक देवताओं का आह्वान कर रहा है.

रिचुअल हीलिंग

 जागर नंदाजात और पाँडव जैसी परंपराएँ महज़ लोकनृत्य और गायन नहीं हैं बल्कि इन अनुष्ठानों या रीतियों से जो उत्तेजना फ़ैलती है उससे आदमी की शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं

प्रोफ़ेसर विलियम सैक्स

उत्तराँचल के कुमाऊँ और गढ़वाल में समान रूप से लोकप्रिय जागर देवताओं की पूजा करने के लिए गाया जाता है और कहते हैं कि इसे गाते-नाचते समय व्यक्ति में देवी या देवता प्रवेश कर जाते हैं.

लेकिन प्रोफ़ेसर सैक्स का कहना है,"जागर नंदाजात और पाँडव जैसी परंपराएँ महज़ लोकनृत्य और गायन नहीं हैं बल्कि इन अनुष्ठानों या रीतियों से जो उत्तेजना फैलती है उससे आदमी की शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं".

प्रो. सैक्स इसे रिचुअल हीलिंग का नाम देते हैं और उनकी राय में सामुदायिक समरसता कायम रखने में भी इसका बड़ा योगदान रहा है.

वे इसी व्यवहार पर शोध भी कर रहे हैं.

पहाड़ का सफ़र


 यहाँ आए तो एंथ्रोपोलॉजिस्ट की हैसियत से लेकिन अब उनका मन यहाँ रम गया है. लोगों से घुलने-मिलने के लिए वे उनके हर काम में शामिल होते हैं, गाय-भैंस को चारा-पानी देने, मंड़ाई-कटाई, यहाँ तक कि कभी वे हल भी पकड़ लेते हैं

वासुदेव मैथानी

मूल रूप से अमरीका के निवासी प्रोफ़ेसर सैक्स ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है.

इसके बाद उत्तराँचल की लोकप्रिय नंदाजात यानी नंदा देवी की डोली यात्रा पर जब वे पीएचडी करने चमोली गढ़वाल आए तटो यहीं के होकर रह गए.

कर्णप्रयाग के क़रीब नउटी नाम के एक गाँव में वे चार साल रहे और फिर 1990 से वे रवाइन जौनसर इलाक़े में रह रहे हैं.

स्थानीय परंपराओं के प्रति उनके समर्पण से अभिभूत होकर एक स्थानीय बुज़ुर्ग ने बद्री प्रसाद नौटियाल का नाम दिया.

नौटियाल साहब

आज पहाड़ों में वे बद्री प्रसाद नौटियाल के ही नाम से लोकप्रिय हैं.

नउटी गाँव के वासुदेव मैथानी कहते हैं,"यहाँ आए तो एंथ्रोपोलॉजिस्ट की हैसियत से लेकिन अब उनका मन यहाँ रम गया है. लोगों से घुलने-मिलने के लिए वे उनके हर काम में शामिल होते हैं, गाय-भैंस को चारा-पानी देने, मंड़ाई-कटाई, यहाँ तक कि कभी वे हल भी पकड़ लेते हैं".

 हमारे देवी-देवताओं को आस्था ने जन्म दिया है. मैदानों की ओर चले गए पहाड़ियों में अब आस्था नहीं बची है और जिनकी है भी वह भय की है, और प्रोफ़ेसर सैक्स की आस्था प्रेम की है

सुरेश काला

चमोली में प्रोफ़ेसर साहब अगर किसी को कहीँ दीख जाएँ तो लोग तपाक से पूछ बैठते हैं- "और नौटियाल जी क्या हाल है?".

पान वाले को पता है कि उनके लिए कौन-सा पान लगाना है और चाय वाली भी जानता है कि उन्हें कैसी चाय चाहिए.

प्रोफ़ेसर सैक्स ने यहाँ की धार्मिक मान्यताओं की वैज्ञानिक और तार्किक विवेचना की है.

नंदाजात का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं,"इसमें पहाड़ की महिलाओं की पीड़ी देखी जा सकती है. माई की प्यार की याद सँजोए और ससुराल के बेगानेपन में जीती, दिन-रात श्रम करती महिला का प्रतीक है नंदा देवी".

काम

प्रो. सैक्स ने 'द माउंटेन गॉडेस' और 'डांसिंग द सेल्फ़' के नामों से यहाँ की लोकसंस्कृति पर किताब भी लिखी है.

उनके ख़ास मित्र और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में अँग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर डी आर पुरोहित उनके बारे में कहते हैं,"ये आदमी असाधारण बुद्धि रखता है और आम आदमी की तरह जीता है. गढ़वाल की संस्कृति का उन्हें तो ऐसा ज्ञान है कि गुप्तकाशी में जब एक आचार्य से उन्हें मिलाया तो आचार्य चकित रह गए".

प्रोफ़ेसर सैक्स के साथ मिलकर उत्तराँचल के लोक नाट्य कला पर काम कर रहे सुरेश काला के शब्द कुछ यूँ हैं,"हमारे देवी-देवताओं को आस्था ने जन्म दिया है. मैदानों की ओर चले गए पहाड़ियों में अब आस्था नहीं बची है और जिनकी है भी वह भय की है, और प्रोफ़ेसर सैक्स की आस्था प्रेम की है".

प्रोफ़ेसर सैक्स की एक जर्मन शिष्या कैरन पोलित भी रिचुअल हीलिंग के उनके शोध में उनकी मदद कर रही हैं और वे भी पिछले डेढ साल से यहीं हैं.

प्रो. सैक्स गढ़वाल यूनिवर्सिटी में लोक केंद्र की स्थापना पर भी काम कर रहे हैं.

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