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सोमवार, 29 मार्च, 2004 को 09:08 GMT तक के समाचार
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स्वर्ण मंदिर में 'कारसेवा' की अजब धुन

स्वर्ण मंदिर
छोटे-बड़े, महिलाएँ-बच्चे सब 'कारसेवा' में जुटे हैं
चित्रों में स्वर्ण मंदिर को देखते इतना समय हो चुका था कि अमृतसर आकर रेलवे स्टेशन से होटल के रास्ते में हर जगह निगाहें उसे ही तलाश कर रही थीं मगर वो तलाश रास्ते में तो पूरी नहीं हुई.

होटल पहुँचकर जब अख़बार उठाया तो देखा कि स्वर्ण मंदिर में ‘कारसेवा’ की तस्वीर छपी है. ज़बरदस्त भीड़, हर तरफ़ बस लोग ही लोग.

श्रीहरमंदिर साहिब यानी स्वर्ण मंदिर के इर्द-गिर्द जो ‘अमृत सरोवर’ है आजकल उसकी सफ़ाई का काम चल रहा है, जिसमें अब तक लाखों लोग हिस्सा ले चुके हैं.

दिन भर के काम काज के बाद मैं रात को ही स्वर्ण मंदिर जा सका और शहर देखने की इच्छा थी इसलिए ‘न्यू रियाल्टो’ सिनेमा के पास पहुँचकर रिक्शा लेना ही बेहतर समझा.

रात के लगभग नौ बज रहे थे और शहर में लोगों की आवाजाही बहुत ज़्यादा नहीं थी मगर जैसे-जैसे हम स्वर्ण मंदिर की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे भीड़ बढ़ती जा रही थी.

'गाँधी गेट' और 'हॉल बाज़ार' से होकर आगे बढ़ा तो देखा कि मंदिर के पास तो काफ़ी भीड़ है और स्थिति बिल्कुल किसी मेले जैसी.

नारों से गूँजता माहौल

लोग मिट्टी से सने हुए मंदिर से बाहर आते दिख रहे थे. छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बूढ़ों तक हर तरफ़ श्रद्धालु ही दिख रहे थे और ‘वाहे गुरूजी दा खालसा, वाहे गुरू दी फ़तह’, ‘बोले सो निहाल सत् श्री अकाल’ और ‘सतनाम वाहे गुरू’ जैसे नारों से पूरा माहौल गूँज रहा था.

स्वर्ण मंदिर
एक बांध बनाकर पानी को अलग करने के बाद 'कारसेवा' का काम चल रहा है

अंदर पहुँचा तो एक अलग ही नज़ारा. सरोवर के पानी को एक तरफ़ करके वहाँ एक बाँध जैसा बना दिया गया है. इस तरह सरोवर की मछलियों की जान भी बची हुई है और काम भी हो रहा है.

इस हिस्से की सफ़ाई अगले चरण में होनी है.

हर तरफ़ बस लोग ही लोग दिखाई दे रहे हैं, मिट्टी से सने हुए. पानी पूरा निकाला जा चुका है और सफ़ाई का काम पूरे जोरों पर है.

लोग ट्रॉलियों में, ट्रकों में और गाड़ियों में काफ़ी दूर-दूर से आए हैं और मक़सद सेवा. महिलाएँ भी पुरुषों के बराबर ही मेहनत में लगी हैं.

जहाँ कुछ लोग सरोवर से निकलने वाली मिट्टी और मलबा बाहर ले जा रहे हैं वहीं बाक़ी रास्ते में गिर रही इस मिट्टी को साफ़ करने में लगे हैं.

पीछे नहीं बच्चे भी

मैंने छोटे-छोटे बच्चों को भी झाड़ू लेकर सफ़ाई करते देखा, पोंछा लगाते देखा. जो सेवा करना वे यहाँ सीख रहे थे वो शायद किसी स्कूल या पाठशाला में नहीं सीखा जा सकता.

यहाँ के लोगों से बात की तो उनका कहना था कि इतनी बड़ी संख्या में स्वर्ण मंदिर में लोग कभी इकट्ठा नहीं हुए और नतीजा ये कि इस ज़बरदस्त भीड़ की वजह से मैं मुख्य भवन के अंदर जा भी नहीं सका.

रात में नहीं जा सका तो कोशिश की अगले दिन काम निपटाकर एक बार फिर जाने की मगर मुख्य भवन में जाने में फिर भी सफल नहीं हुआ.

तो सोचा लोगों से ही इस बारे में कुछ और बातें जान ली जाएँ. पता चला कि ये कारसेवा इस बार 31 वर्षों के बाद हो रही है. यानी पिछली बार जब हुई होगी तो मैं इस दुनिया में पहुँचा भी नहीं था.

पहली कारसेवा 17 जून 1923 को हुई और दूसरी कारसेवा 31 मार्च 1973 को की गई थी.

कारसेवा के पहले ही दिन इतना जोश था कि लोगों ने लगभग तीन चौथाई काम पूरा कर दिया था. वैसे इसे अंतिम कारसेवा माना जा रहा है क्योंकि इसके बाद सरोवर में फ़िल्टर किया हुआ पानी डाला जाएगा.

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