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'भारत सुरक्षा यात्रा की सार्थकता?' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने वाराणसी में मार्च में बम धमाकों के बाद इन यात्राओं की घोषणा की थी जो यात्राएँ 10 मई को दिल्ली में समाप्त होंगी. लालकृष्ण आडवाणी अपनी पाकिस्तान यात्रा और वहाँ मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में दिए बयान के बाद विवादों में घिर गए थे और माना जा रहा है कि इस यात्रा से वो अपने आपको पार्टी में एक बार फिर स्थापित करना चाहते हैं. वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का कहना है, ''जिन्ना विवाद के बाद आडवाणी पार्टी में अलग-थलग पड़ गए थे. इस यात्रा का मुख्य मक़सद अपने आपको पुनर्स्थापित करना है." यह यात्रा शुरू से ही विवादों में घिर गई. ऐसे आरोप लगे थे कि लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी और अध्यक्ष को बिना विश्वास में लिए हुए, इसकी घोषणा कर दी थी. हालाँकि पार्टी ने बाद में इसका खंडन किया और कहा कि यह सोचा समझा फैसला था. उधर विश्व हिंदू परिषद ने भी उनकी आडवाणी की यात्रा की आलोचना कर दी. विहिप के वरिष्ठ नेता गिरिराज किशोर का कहना था कि लोगों का लालकृष्ण आडवाणी पर से विश्वास उठ गया है. इसके बाद मीडिया में ऐसी ख़बरें आईं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी भी इन यात्राओं को लेकर सहमत नहीं हैं. लेकिन बाद में इन ख़बरों का भी खंडन किया गया. माना जा रहा है कि आडवाणी की यात्रा पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की यात्रा पर भारी पड़ रही है. पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि आडवाणी यात्राओं के केंद्र बिंदु हैं. कई राजनीतिक दलों ने भाजपा नेताओं की इन यात्राओं पर आपत्ति जताई है. तुष्टीकरण की आलोचना दूसरी ओर लालकृष्ण आडवाणी ने यात्रा से पहले पत्रकारों से बातचीत में कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण का आरोप लगाया और कहा कि इससे पूरे देश में असुरक्षा का माहौल बन गया है. उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों पर निशाना साधते हुए कहा था कि इन दलों ने भारतीय राजनीति को सांप्रदायिक कर दिया है. आडवाणी का कहना था, "भारत धर्मनिरपेक्ष देश इसलिए है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं. हिंदू धर्म सहिष्णु है तभी यहां मुसलमान राष्ट्रपति, सिख प्रधानमंत्री और सत्तारुढ़ दल की नेता ईसाई हो सकती है." |
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