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बुधवार, 30 नवंबर, 2005 को 18:51 GMT तक के समाचार
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उमा बन सकती हैं 'असली भाजपा'

उमा भारती
उमा भारती दूसरी पंक्ति की गिनी-चुनी नेता हैं जिनके पास जनाधार है
लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी इन दोनों नेताओं को जो करना था राजनीति में कर चुके हैं और अब इनकी जगह कौन आएगा यह सवाल बना हुआ है.

बीजेपी के अंदर जो दूसरी कतार के नेता हैं वह इन दो नेताओं की जगह लेना चाहते हैं और उनमें इस बात की होड़ लगी हुई है कि कौन आए. इसलिए एलीमिनेशन की थ्योरी चल रही है यानी जो योग्य है उसे बाहर करो.

सबसे पहले गोविंदाचार्य को बाहर किया गया. इसके बाद अब उमा भारती. उमा भारती जनता से जुड़ी हुई हैं और उनके नाम पर मध्य प्रदेश में चुनाव लड़ा गया था. बीजेपी में आज कोई अगर मास लीडर है तो वह उमा भारती हैं.

आज पूरे हिंदुस्तान की राजनीति जिस तरह ज़मीन पर खड़ी है उसमें सबसे ऊँची उड़ान अगर किसी की हो सकती है तो वह उमा भारती की हो सकती है.

सामाजिक आधार पर, महिला होने के नाते और एक परिश्रमी, प्रतिभावान महिला होने के नाते.

बीजेपी में जो महासचिव हैं उनको यह लगता है कि उमा भारती अगर पार्टी में रहती हैं तो अंततः उन्हें मौका नहीं मिलेगा, उमा भारती को मिलेगा इसलिए उमा भारती को पिछले एक वर्ष से लगातार अपमानित करने का सिलसिला चल रहा है.

आपको याद होगा कि पिछले साल नवंबर में पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में अपनी बात न रखने देने पर उमा भारती ने हंगामा किया था और इसके बाद उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया था.

बाद में पार्टी के नेताओं को लगा कि उमा भारती का सवाल सही है कि वे पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में अपनी बात नहीं रखेंगी तो कहाँ रखेंगी. और उन्हें पार्टी में वापल लिया गया.

महासचिव

जब वे वापस आईं तो वे महासचिव बनकर पार्टी का काम करना चाहती थीं और वे आडवाणी की सचिव बनकर भी काम करने को तैयार थीं. लेकिन आडवाणी जी ने इस पर ख़ुद विचार करने की जगह दूसरे नेताओं से सलाह ली और उमा को एक बार फिर रोक दिया गया. इससे ये साबित हुआ कि पार्टी का अध्यक्ष अपने महासचिवों की क़ैद में है.

अरूण जेटली
महासचिव जेटली और उमा भारती में काफ़ी समय से अनबन चलती रही है

इसके बाद बाबूलाल गौर की कार्यप्रणाली से नाराज़ मध्य प्रदेश के 126 विधायकों ने ख़ुद ही एकत्र होकर उन्हें हटाने की माँग की और कहा कि उमा भारती को वापस भेज दीजिए. लेकिन शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री मनोनीत कर लिया गया.

संसदीय बोर्ड में बड़े नेता, अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह, आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी चाहते थे कि दो पर्यवेक्षक भेजे जाएँ और विधायक जिसके पक्ष में हों उसे मुख्यमंत्री बना दिया जाए. लेकिन वेंकैया नायडू ने, जो संसदीय बोर्ड की बैठक में नहीं थे, धमकी दी थी कि अगर उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाया गया तो वे पार्टी में नहीं रहेंगे.

उमा भारती ने विधायक दल की बैठक छोड़कर बाहर आने के बाद फौरन जो फैसला किया वह मास लीडर या जन नेता का काम है. और अब जिस मुद्दे पर वह पदयात्रा कर रही हैं वह मुद्दा ही वास्तव में 'यूएसपी' होगा.

संघर्ष

नेतृत्व यानी पार्टी पर कब्ज़ा करने की लड़ाई चल रही है तो ये केवल उमा भारती बाहर हो जाने से रूकेगी नहीं. उमा भारती बाहर गई हैं तो अब यह लड़ाई बचे हुए लोगों में शुरू हो चलेगी.

प्रमोद महाजन
महाजन सबसे प्रभावशाली महासचिव माने जाते हैं

और इसकी शुरुआत हो गई है. प्रमोद महाजन भोपाल में बैठे हैं और शिवराज सिंह चौहान अकेले मुख्यमंत्री की शपथ ले रहे हैं.

यह इस बात का प्रमाण है कि शिवराज सिंह चौहान को अपनी टीम बनाने का अधिकार इन लोगों ने नहीं दिया है. शिवराज सिंह की टीम बनाएंगे प्रमोद महाजन.

तो अरूण जेटली और प्रमोद महाजन का टकराव यहाँ से शुरू होगा. अरूण जेटली प्रदेश के प्रभारी थे, अरूण जेटली ने मुख्यमंत्री बनवाया है. तो मुख्यमंत्री कोई बनवा रहा है, टीम कोई बनवा रहा है और इस तरह से मुख्यमंत्री का जो अधिकार है, स्वायत्ता है वह तो खतरे में पड़ेगी ही, वह मुख्यमंत्री कुछ काम भी नहीं कर पाएगा.

तो ये जो अंदरुनी संकट है, जो पार्टी किसी नियम से नहीं चलती, परंपरा से नहीं चलती, मनमाने तौर तरीकों से चलती है और सत्ता के पार्टी की सत्ता हो या दूसरे तरह के स्वार्थों से जो पार्टी चलती है.

भविष्य

उस पार्टी का ये अंदरुनी संकट मात्र उमा भारती को बाहर कर देने से नहीं रूकेगा बल्कि यह संकट और बढ़ेगा और आपस में राग-द्वेष है, वैमनस्य है वो टकराहट का रूप लेगा तो बीजेपी के अंदर जो एक इमेज रही है अनुशासित दल की वह तो चूर-चूर हो गई है. लेकिन अब वहाँ एक सत्ता का संघर्ष ऐसा चलेगा जिसमें कि पार्टी निरंतर खोखली होती जाएगी.

दूसरा संकट उमा भारती ने जो रास्ता चुना है वह भोपाल से अयोध्या जाएँगी यानी सीधे वह जनता के बीच चली गईं. और उनका मुद्दा है ‘राम और रोटी’. स्वराज, स्वाभिमान और स्वदेशी जैसा उन्होंने कहा है ये तीनों मुद्दे भाजपा की पहचान है.

लेकिन भाजपा एनडीए में रहते हुए इन मुद्दों के साथ वह विश्वासघात की दोषी रही है इसलिए मुद्दे पर कब्ज़ा अब उमा भारती का होगा. और अंदरुनी संकट के कारण भाजपा को जो समर्थन करते रहे हैं वह तटस्थ हो जाएँगे.

उमा भारती ठीक-ठाक चलती रहेंगी तो सच कहा है उन्होंने कि असली भाजपा वही हो जाएँगीं.

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