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भाजपा का बढ़ता वैचारिक संकट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान संकट उसके वैचारिक संकट से जुड़ा है. इस समय वह एक निर्णायक दौर से गुज़र रही है. अब यह तय होना है कि आने वाले वर्षों में उसकी राजनीति की दिशा और स्वरूप क्या होंगे. साथ ही यह भी तय होना है कि मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ उसके किस प्रकार के रिश्ते रहेंगे, उसे अपने सांगठनिक एवं राजनीतिक कार्यकलापों के लिए कितनी स्वायत्तता प्राप्त होगी और महत्व की दृष्टि से संघ परिवार के बीच उसका क्या स्थान होगा. लालकृष्ण आडवाणी भाजपा अध्यक्ष बने रहते हैं या नहीं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है. अधिक महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी उनके राजनीतिक अभिप्राय को समझकर और उसे अपनी विचारशैली में आत्मसात करके आगे बढ़ने का साहस जुटा पाती है या नहीं. भाजपा में बढ़ रही अनुशासनहीनता उसकी वैचारिक दिशाहीनता का ही परिणाम है. 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद से हर बार अन्य दलों से हाथ मिलाने के बाद भाजपा की ताक़त बढ़ी. जब 1998 में उसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया तो उसे उम्मीद थी कि इस बार भी ऐसा ही होगा. अन्य दलों पर उसकी निर्भरता निरंतर कम होती जाएगी और अंततः वह लोकसभा में अपने बल-बूते पर बहुमत हासिल करने में सफल होगी. यही सोचकर उसने संविधान की जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने वाली धारा 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता और अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर भव्य राम मंदिर निर्माण जैसे बुनियादी मुद्दों को ठंडे बस्ते में डालने का फ़ैसला लिया. उसने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बार-बार यही समझाया कि इन मुद्दों को केवल कुछ समय के लिए स्थगित भर किया गया है, छोड़ा नहीं गया है. जैसे ही वह अपने बल-बूते पर केंद्र में सरकार बनाने में समर्थ होगी, वैसे ही इन मुद्दों पर पुरानी नीति अमल में लाई जाएगी. नया दौर लेकिन छह साल तक सत्ता में रहने के बाद लालकृष्ण आडवाणी जैसे पार्टी रणनीतिकारों को समझ में आ गया कि भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का युग संक्षिप्त नहीं बल्कि दीर्घ सिद्ध होने वाला है. अपने बल-बूते पर तो भाजपा विपक्ष में ही बैठ पाएगी. हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों पर अक्षरशः चलकर वह देश के अल्पसंख्यकों से हमेशा कटी रहेगी. इसलिए उसे एक सर्वसमावेशी राजनीति का ख़ाका तैयार करना होगा. पाकिस्तान में मोहम्मद अली ज़िन्ना की कब्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके, उन्हें ‘इतिहास निर्माता’ एवं धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान का स्वप्नदृष्टा बताकर और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के दिन को अपने जीवन का सर्वाधिक दुखद दिन कहकर लालकृष्ण आडवाणी ने भाजपा एवं वृहत्तर संघ परिवार में हड़कंप मचा दिया. लेकिन शिवसेना को छोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों की ओर से उन्हें भरपूर समर्थन मिला. यहाँ तक कि सत्तारुढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में शामिल लालू यादव और रामविलास ने भी आडवाणी को सही माना. भारत विभाजन की सच्चाई को स्वीकार करके आडवाणी ने संकेत दिया कि अब भाजपा बहुत दिन तक अतीत के बोझ को नहीं ढो सकती. भाजपा का केंद्रीय अंतर्विरोध यह है कि एक संकीर्ण हिंदू सांप्रदायिक विचारधारा के आधार पर राजनीति करते हुए वह देश के सभी भागों और भारतीय जनता के सभी समुदायों में स्वीकृत होना चाहती है. यदि वह अपनी छवि बदलती है तो उसके सामने अस्मिता का संकट खड़ा हो जाता है और उसका कार्यकर्ता ठगा-सा महसूस करने लगता है. यदि वह जस की तस बनी रहती है तो सत्ता से निर्वासित रहने को अभिशप्त है. यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस गुत्थी को कैसे सुलझाता है. |
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