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शनिवार, 25 मार्च, 2006 को 07:44 GMT तक के समाचार
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कश्मीरी पंडितों की सेना में भर्ती

संजय भट्ट
कश्मीरी पंडित युवा सेना में भर्ती को आगे आए हैं
भारत प्रशासित कश्मीर में पिछले 16 वर्षों से अलगाववादी हिंसा के कारण घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडित युवक सेना में भर्ती के लिए आगे आए हैं.

जम्मू क्षेत्र के विभिन्न विस्थापित कैंपों से 36 युवक सेना में भर्ती के लिए आए थे जिनमें से 10 चुने गए हैं.

लेकिन घाटी से विस्थापन के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि कश्मीरी पंडित युवक सेना में भर्ती के लिए आगे आए.

सेना में भर्ती के लिए ये लोग कश्मीर क्षेत्र में गए थे और अब प्रशिक्षण के लिए भी वहीं जा रहे हैं.

 जब हमसे पूछा गया कि काम करोगे तो हम हैरान हो गए क्योंकि हमने कभी ये सोचा भी नहीं था कि हमें कहीं काम मिलेगा
संजय भट्ट

सेना में भर्ती होने के बाद इन लड़कों के चेहरे पर अलग भाव हैं. जहाँ दिल में नौकरी मिलने की खुशी है वहीं घर से दूर रहने की मायूसी भी.

सेना में ही भर्ती होने का कैसे सोचा, इस बारे में पूछने पर 10वीं तक पढ़े संजय कुमार भट्ट ने बताया, ''पढ़ाई के अधिक साधन न होने के कारण दसवीं के बाद कई प्राइवेट नौकरियाँ की लेकिन उनमें गुज़ारा करना भी मुश्किल था.''

संजय बताते हैं, ''जब हमसे पूछा गया कि काम करोगे तो हम हैरान हो गए क्योंकि हमने कभी ये सोचा भी नहीं था कि हमें कहीं काम मिलेंगा.''

वो बताते हैं कि हमसे कहा गया कि नौकरी तो है मगर सेना में, तो हमारा जवाब था सेना क्या हम तो कहीं भी नौकरी करने के लिए तैयार हैं.

नौकरियों को प्राथमिकता

अक्सर देखा जाता है कि भारतीय कश्मीरी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं.

विस्थापित कैंप में ही अपनी छोटी सी दुकान चलाने वाले 23 वर्षीय विनोद कुमार ने दुकान के बदले सेना को चुना.

विनोद कहते हैं कि ‘प्राइवेट नौकरी या कामकाज तो अस्थाई ही होता है और सरकारी नौकरी सरकारी होती है.’

 अब कश्मीर के हालात वो नहीं रहे जो पहले हुआ करते थे, अब बंदूक का खौफ़ नहीं रहा और वादी के हालात बेहतर हो रहे हैं
विनोद कुमार

उनके घर वालों को कैसा लगा, इस पर विनोद का कहना था, ''घर के लोगों में डर था, मगर जब से चयन हो गया है और आदेश आ गए है तब से उन्हें भी खुशी है.''

जहाँ से वह अपना घर बार छोड़ कर आए थे, वहाँ जाने में अब कोई मुश्किल तो नहीं. इस पर विनोद का उत्तर था, '' अब कश्मीर के हालात वो नहीं रहे जो पहले हुआ करते थे, अब बंदूक का खौफ़ नहीं रहा और वादी के हालात बेहतर हो रहे हैं.''

विनोद और संजय तो केवल सेना में भर्ती के लिए ही गए थे वहीं उनके एक और साथी रिंकू पंडित के लिए यह एक ख्वाब जैसा था.

जब रिंकू का परिवार घाटी से विस्थापित हुआ तो वे स़िर्फ ढ़ाई वर्ष के थे. उसके लिए बर्फ और डल झील देखना एक सपना था, जो इस दौरान पूरा हुआ. रिंकू ने बताया कि उसने डल झील भी देखी और बर्फ से भी खेले.

इन विस्थापित कश्मीरी पंडितों को रोज़गार के नाम पर सेना में भर्ती के लिए प्रोत्साहित करने वाली सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष डॉ दृक्षा अंदराबी कहती हैं कि आज तक सभी सरकारें इन्हें वापस वादी में पुनर्स्थापन की बात करते रही हैं.

लेकिन इनको वापस भेजने के बारे में किसी ने कुछ नहीं किया. वे कहती है कि कश्मीरी पंडितों को इस तरह बेकार बैठा देख उन्होंने इन नौजवानों को सेना में जाने के लिए प्रोत्साहित किया.

मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी की तरह लंबे बाल रखने वाले संजय कुमार भट्ट को अब सेना में जाने पर अपने बाल तो कटवाने होंगे ही.

इस पर संजय कहते हैं, ''मैं तो चाहता हूं कि मेरा कमांडर ही मेरे बाल काटे.''

कश्मीरी विस्थापितविस्थापन का दर्द
15 साल पहले घाटी छोड़नेवाले हज़ारों कश्मीरी पंडित नाउम्मीद और निराश हैं.
कश्मीरी पंडितवहाँ ख़ुशी तो यहाँ ग़म
विस्थापित कश्मीरी पंडित इस बस सेवा से कुछ ख़ास ख़ुश नज़र नहीं आते.
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