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गुरुवार, 23 मार्च, 2006 को 05:00 GMT तक के समाचार
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पीढ़ी दर पीढ़ी शरणार्थी रहने की मजबूरी

शरणार्थी
शरणार्थियों के दिन ग़रीबी में गुज़र रहे हैं
"1947 में बँटवारे के दौरान हमें मुसलमान मार देते तो आज ये दिन देखने को नहीं मिलता. आज न तो हम हिंदुस्तान के नागरिक हैं और न ही पाकिस्तान के."

"हमारे साथ पाकिस्तान से आए लोगों में से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए, इंद्र कुमार गुजराल भी प्रधानमंत्री बने. लालकृष्ण आडवाणी भी पाकिस्तान से आए थे. जो दूसरे राज्यों में चले गए उनको सब कुछ मिल गया मगर जो यहाँ रह गए वो भिखारी बन गए."

ग़ुस्से और लाचारी भरी बातें हैं ये स्वर्ण सिंह की जो 1947 में पाकिस्तान से विस्थापित होने के बाद जम्मू और कश्मीर में आकर बसे थे.

उनका परिवार पाकिस्तान में सियालकोट ज़िले के शकरपुर गाँव से विस्थापित होकर जम्मू आया था.

कोई और काम काज न होने की वजह से स्वर्ण सिंह सेना में भर्ती हो गए.

मगर अब ख़ुद उनके और उनके जैसे कई और शरणार्थी परिवारों की आने वाली पीढ़ियों के लिए सेना में भर्ती होना भी मुश्किल है.

कारण है सेना में भर्ती के लिए जम्मू कश्मीर का मूल निवासी होने की अनिवार्यता.

ऐसे में विभाजन के समय जम्मू कश्मीर में आकर बसे लगभग 50 हज़ार परिवारों के तीन लाख से भी अधिक सदस्यों के लिए यहाँ रहकर गुज़र बसर करना भी मुश्किल हो रहा है.

नागरिकता ही नहीं

वे बताते हैं कि जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की तरफ से आए थे उन्हें तो राज्य का नागरिक मान लिया गया लेकिन पाकिस्तान के बाक़ी हिस्सों से जम्मू आकर बसे विस्थापित अभी भी राज्य की नागरिकता से महरूम हैं.

स्वर्ण सिंह
स्वर्ण सिंह के बच्चों को दूसरे राज्यों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है

जम्मू कश्मीर में लागू धारा 370 के अनुसार राज्य में वही नौकरी पा सकता है या ज़मीन जायदाद ले सकता है जिसके पास राज्य की नागरिकता हो. यहाँ तक कि उच्च शिक्षा पर भी रोक है.

पश्चिमी पाकिस्तान से आकर पिछले छह दशकों से शरणार्थी की तरह गुज़र बसर कर रहे इन शरणार्थियों की पीड़ा उनकी बातों से झलकती है.

रोज़ी रोटी

स्वर्ण सिंह ने कहा कि वे अपने बच्चों को बाहरी विश्वविद्यालय के माध्यम से पढ़ा रहे हैं. वे कहते हैं,"हमें न तो नौकरी मिल सकती है और ना ही कोई लाइसेंस, हमारे बच्चे पढ़ाई लिखाई भी नहीं कर सकते."

 60 वर्षों बाद भी हम शरणार्थी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. हमें नौकरी नहीं मिलती, वोट नहीं देने देते पता नहीं क्या बात है
निर्मला देवी

विस्थापित महिला निर्मला देवी पूछती हैं, "हमें राज्य सरकार ने आज तक क्या दिया है?"

ग़ुस्से भरे स्वर में निर्मला ने कहा, "60 वर्षों बाद भी हम शरणार्थी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. हमें नौकरी नहीं मिलती, वोट नहीं देने देते पता नहीं क्या बात है."

इन विस्थापित परिवारों को लोकसभा चुनाव में मतदान करने का तो हक़ है पर ये राज्य विधानसभा चुनाव के लिए मतदान नहीं कर सकते.

कमला रानी ने अपनी आँखों से विस्थापन और उसके बाद का मंज़र देखा है.

कमला बताती हैं कि शरणार्थी परिवारों के लिए कामकाज के साधन हैं मज़दूरी करना और सब्ज़ी या फल बेचकर गुज़ारा करना.

भरी हुई आँखों और दबी हुई जुबान से कमला बताती हैं, "जो दिन को कमाते हैं वही रात में खाना होता है जब दिन में कोई काम नहीं मिल पाता तो रात को भूखे पेट ही सोना पड़ता है."

संघर्ष और राजनीति

ऐसा नहीं है कि ये शरणार्थी चुपचाप बैठे रहे हैं. इन्होंने अपना हक़ माँगने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है.

 60 सालों से राज्य में नागरिक अधिकारों के बिना रह रहे इन विस्थापितों के अब बच्चों के बच्चे भी हो चुके हैं और इतने लंबे संघर्ष के बाद इन्हें नागरिक अधिकार मिलने ही चाहिए
मुज़फ़्फ़र हुसैन बेग़, उपमुख्यमंत्री

फिर भी मिला कुछ नहीं. इसका कारण पूछने पर वेस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजी एक्शन कमिटी के अध्यक्ष लाभ राम गाँधी कहते हैं कि विस्थापित हुए सभी परिवार हिंदू हैं और शायद सरकार को यह डर है कि अगर हमें नागरिक अधिकार मिल जाएंगे तो जम्मू में हिंदुओं की तादात बढ़ जाएगी.

जम्मू कश्मीर सरकार भी मानती है कि शरणार्थियों को अधिकार मिलना चाहिए.

जम्मू कश्मीर के उप मुख्यमंत्री मुज़फ्फ़र हुसैन बेग, जो क़ानून मंत्री भी हैं का कहना था कि ये कोई सियासी नहीं बल्कि इंसानी मसला है और इसे कैबिनेट में बैठक कर सुलझा लिया जाना चाहिए.

बेग मानते हैं, "60 सालों से राज्य में नागरिक अधिकारों के बिना रह रहे इन विस्थापितों के अब बच्चों के बच्चे भी हो चुके हैं और इतने लंबे संघर्ष के बाद इन्हें नागरिक अधिकार मिलने ही चाहिए."

वो ये भी मानते हैं कि उनको अधिकार भी राज्य सरकार को दिलाना है.

शरणार्थियों के पास सिर्फ़ उम्मीदें हैं और वो तो उनके पास पिछले छह दशकों से है.

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