|
दर्द भरी कहानी पंद्रह साल पुरानी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"अपनी ज़मीन छोड़े आज 15 साल हो गए हैं पर भागकर न आते तो क्या ज़िंदा रह पाते. फिर भी अंतिम इच्छा तो यही है कि मरने से पहले एक बार कश्मीर देख लूँ तभी आत्मा को शांति मिलेगी," 1990 से दिल्ली में शरणार्थी की ज़िंदगी गुज़ार रहीं अद्वैतवादिनी कौल का दर्द साफ़ झलकता है. वे कश्मीर से आने वाली अकेली महिला नहीं हैं. एक अन्य कश्मीरी विस्थापित उत्पल कौल बताते हैं, "घाटी में 1989 कश्मीरी पंडितों पर हिंसक वारदातों का बढ़ना और ऐसी घटनाओं में तकरीबन दो हज़ार कश्मीरी पंडितों का मारा जाना ही आज दिल्ली में लाखों की तादाद में रह रहे कश्मीरी शरणार्थियों की बदहाल जिंदगी का कारण है." उत्पल बताते हैं, "हम हर साल अपने शहीद परिजनों को याद करने के लिए 14 सितंबर को शहीद दिवस मनाते हैं ताकि भारत की सरकार और विश्व समुदाय हमारे दर्द को जान सके. हालांकि पिछले 15 सालों से केंद्र और राज्य, दोनों ने ही हमारी उपेक्षा की है." कश्मीर के इस समुदाय के लोगों ने दिल्ली में राजघाट पर एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की. साथ ही जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन किया. ऐसे ही कार्यक्रमों का आयोजन जम्मू में भी किया गया है. वक़्त की मार गौरतलब है कि 1989 में इसी तारीख को कश्मीर में चरमपंथियों ने कश्मीरी पंडितों के नेता टिक्कालाल टपलू की हत्या कर दी थी. उसके बाद कई हिंसक वारदातों में बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी जिसके चलते तकरीबन पाँच लाख कश्मीरी पंडित विस्थापित जीवन जी रहे हैं.
इन विस्थापितों की मानें तो दिल्ली में इनकी संख्या दो से ढाई लाख के बीच है जबकि दिल्ली के सरकारी रजिस्टरों में केवल 20 हज़ार विस्थापित ही पंजीकृत हैं. जम्मू में यह तादाद 55 हजार के करीब है. एक अन्य शरणार्थी कहते हैं, "हम अपना ही पता नहीं जानते. कब तक तंबुओं में गुज़र होगा. सरकार से कोई राहत या सहायता भी आज तक नहीं मिल पाई. अपने ही देश में हमारी इस हालत से ज़्यादा दुखद और क्या हो सकता है." दिल्ली में कश्मीर समिति के अध्यक्ष सुनील शकधर बताते हैं, " वर्ष 2003 में हमने दिल्ली में रह रहे 30 हजार कश्मीरियों के पंजीकरण की माँग तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस के सामने रखी थी पर उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है." "पिछले दिनों इस सूची को गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने कश्मीर सरकार को जाँच के लिए दिया है पर जब हमारा वहाँ कुछ बचा ही नहीं तो जाँच कैसे होगी. घर जला दिए या फिर लूट लिए गए हैं. राज्य सरकार की मंशा हमारी मदद करने की कतई नहीं है." माँग विस्थापित लोग अपने घर जाना तो चाहते हैं पर जाने का हौसला खो चुके हैं. उत्पल कौल कहते हैं, "हमारी स्थिति के लिए केंद्र की पिछले 15 सालों की सरकारें ज़िम्मेदार हैं. पहले शांति बहाल हो, पाकिस्तान और आतंकवादी संगठनों को समझाया जाए, उसके बाद ही लौटने का मनोबल समेट पाएँगे."
सुनील बताते हैं, "सरकार को हमने एक मैप सुझाया है. झेलम के उत्तर-पूर्व में हम कश्मीरी अल्पसंख्यकों को बसाया जाए. हम पृथक कश्मीर नहीं माँग रहे, केंद्र शासित क्षेत्र माँग रहे हैं ताकि सुरक्षित रह सकें." किरण कौल के ससुर पिछले साल ही गुजर गए. मरने से पहले वो अपने घर लौटना चाहते थे पर उनकी आखिरी इच्छा पूरी न हो सकी और वो चल बसे. किरण की आँखों में आँसू हैं और दिल में घर से जुदा होकर बेनामी जिंदगी जीने का दर्द. इसी दर्द का क़िस्सा बयान करते इनके शहीद दिवस का पंद्रहवाँ साल भी पूरा हो गया. केंद्र और राज्य की सरकारों को दिए जा चुके हजारों ज्ञापनों और इस तरह के प्रदर्शनों के सहारे इन्हें अपनी समस्याओं का हल निकलने की आस है. जहाँ एक ओर मेज के आमने-सामने बैठकर भी कश्मीर समस्या का हल अब तक नहीं निकल पाया है, वहाँ इन कश्मीरी विस्थापितों को कब न्याय मिलेगा, यह कह पाना अभी असंभव ही है. ख़ास कर तब, जबकि विस्थापित अभी भी कश्मीर मसले पर बातचीत के एजेंडे तक में नहीं हैं और न ही इनकी बातचीत में कोई हिस्सेदारी है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||