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शुक्रवार, 24 मार्च, 2006 को 11:13 GMT तक के समाचार
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'मैं पूर्वी हूँ या पश्चिमी?'

नईमा अहमद

अभी मैंने दुनिया की नज़ाकतों को समझना ही शुरू किया था कि मेरे दिमाग़ पर पूर्व और पश्चिम की तलवार खड़ी कर दी गई और पूर्वी संस्कृति से लेकर पूर्वी मूल्यों का पाठ ज़बानी याद करने की हिदायत दी गई.

स्कूल जाऊँ तो पूर्वी लबादा ओढ़ कर, टीवी देखूं तो पूर्वी आँखों से, बात करूं तो पूर्वी आदाब से, और अगर कोई ख़्वाहिश ज़ाहिर करूं तो पूर्वी थप्पड़ खाऊँ.

यानी पूर्वी मूल्यों में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं रखी गई थी कि मैं अपनी ख़्वाहिश, अपना विचार दिल खोल कर अपने और बेगानों के सामने रख सकूँ नहीं तो बाग़ी का लेबल मेरे माथे पर कब का लगा दिया गया होता.

अगर मेरे माता पिता चुपके से मेरे कमरे में घुस कर बिस्तर के सिरहाने कोई अंग्रेज़ी का उपन्यास देखते तो अगले 24 घंटों के लिए बिजली गिरने, बरसात होने और बादल गरजने की भविष्यवणी को कोई टाल नहीं सकता.

वह दिन मैं अब भी नहीं भूली जब मैं ने बड़े कमरे में रखे टेवी पर अंग्रेज़ी सीरियल (धारावाहिक) देखना चाहा था कि जैसे पूरे घर में एक भयानक भूकंप आ गया हो. माँजी की चीख़ पुकार से पड़ोसी मेरी इस हरकत पर चकित रह गए और सीआईए की तरह जांच पड़ताल के कड़े मरहले से गुज़रना पड़ा.

ऐसे हालात में किसी की क्या मजाल कि कोई अपने दिल की बात किसी के सामने करे. मैंने यह सबक़ याद किया था कि पूर्वी लड़कियाँ अपनी ख़्वाहिश ज़ाहिर नहीं करतीं बल्कि उनको गाए की तरह हांक कर ठिकाने लगाया जाता है.

फिर आया एक बदलाव...

फिर एक चमत्कार हुआ. नौकरी के बहाने मुझे पश्चिम की ओर आना पड़ा तो यक़ीन मानिए कि माता पिता ने न सिर्फ़ पास पड़ोस में बल्कि पूरे ख़ानदान में ढोल बजा बजा कर इसका ऐलान किया.

मैं कई दिनों तक अपने कानों पर भरोसा नहीं कर सकी और भरोसा भी उस वक़्त हुआ जब मैंने लंदन की धरती पर क़दम रखा.

पश्चिम में रहने के बावजूद मैं अब भी पूर्वी हूँ बल्कि पूर्वी मूल्यों की और अधिक प्रसंशक बन गई हूँ.

कुछ कुछ मज़हबी भी हूं. अपनी ज़ुबान बोलती हूं और पूर्वी लिबास भी पहनती हूँ. हालांकि क्षेत्रीय लोग कभी कभी मुझे संदिग्ध भी समझते हैं.

ख़ास बात यह है कि पूर्व और पश्चिम के बीच बहुत फ़र्क़ महसूस करने लगी हूँ और दोनों संस्कृतियों की अच्छाइयों को अपना चुकी हूँ.

ऐसी भी विडंबना

मैं सच बोलना सीख गई हूँ जो पूर्व में बहुत अहम है. अपने पूर्ववासियों से बात करती हूँ तो वे पश्चिम ग्रस्त कहते हैं और पश्चिम वाले अब भी मुझे ग़ैर समझते हैं.

मेरे मुहल्ले का हर नौजवान पश्चिम आने का सपना देखता है लेकिन मेरे पश्चिम में रहने पर ताने देता है. कभी भाग्यवान भी समझते हैं कि मुझे यहाँ आने का मौक़ा मिला. फिर भी मेरी हर बात को ग़लत ठहराते हैं.

मेरे खुले दिल और खुले दिमाग़ को रास्ते से भटका हुए में गिनते हैं, मेरे विचारों की आज़ादी को ज़हनी गिरावट समझते हैं.

मैं उन्हें कितना भी कहूँ कि मैं पूर्व और पश्चिम के गुणों का मिश्रण बन गई हूँ मगर उन्हें मुझमें कोई ख़ूबी नहीं दिखती.

यह कैसी विडंबना है कि पश्चिम वाले मुझे रूढ़िवादी कहते हैं और पूर्वी लोग मुझे पश्चिमग्रस्त कह कर मेरा मज़ाक़ उड़ाते हैं.

मैं अपने आप को पूर्वी कहूँ या पश्चिमी मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम......

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