|
बाहरी लोगों के बसने पर रोक की माँग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में पर्यावरणविदों ने माँग की है कि भूकंप और सूनामी लहरों से तबाह अंडमान निकोबार द्वीपों पर बाहरी लोगों के बसने पर नियंत्रण लगाया जाए. विशेषज्ञों का मानना है कि भारी तबाही के बाद अब अंडमान निकोबार के द्वीप बड़ी आबादी को झेलने में सक्षम नहीं रह गए हैं. उल्लेखनीय है कि 1901 में भारत के इन सुदूरवर्ती द्वीपों की कुल आबादी क़रीब 25 हज़ार ही थी. इसके ठीक सौ साल बाद आबादी बढ़ कर साढ़े तीन लाख हो गई. एक अनुमान के मुताबिक अंडमान निकोबार द्वीपों की मौजूदा आबादी पाँच लाख के क़रीब होगी. अंडमान निकोबार पारिस्थिकी सोसायटी (सैने) के समीर आचार्य कहते हैं, "एक बड़ी आबादी के बोझ को सहन करना मुश्किल है. तटों पर रहना अब बहुत ख़तरनाक हो चुका है. हमें डर है कि लोग पहाड़ियों और जंगलों का रुख़ करेंगे जो कि आदिम जनजातियों के इलाक़े हैं." सैने और कल्पवृक्ष जैसे संगठन एक अरसे से माँग करते रहे हैं कि स्थानीय पर्यावरण के संरक्षण के लिए बाहरी लोगों के बसने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए. कल्पवृक्ष के पंकज सेकसरिया कहते हैं, "अंडमान निकोबार के द्वीपों पर बाहर के लोगों के बसने पर रोक लगनी चाहिए. बाहर से आकर बसने वाले किशानों और मछुआरों के लिए काम ढूंढना मुश्किल हो चुका है. ऐसे में यहाँ आने वाले लोग बोझ के समान हैं." पोर्ट ब्लेयर से 15 किलोमीटर दूर के गाँव चौलदारी के जोगेन मंडल की भी यही चिंता है. वह कहते हैं, "धान की हमारी पूरी फसल चौपट हो गई है. नारियल, सुपारी और केले के पेड़ भी जल्दी ही सूख जाएँगे. हमारी ज़मीन लंबे अरसे तक बेकार रहेगी." खारे पानी की समस्या अंडमान निकोबार के आबाद 38 द्वीपों के खेती योग्य भूमि के बड़े हिस्से पर सूनामी लहरों का कहर बरपा है. खारे पानी के प्रभाव में आने के कारण लगता नहीं कि अगले कुछ वर्षों तक ऐसी ज़मीन पर खेती की जा सकेगी.
सबसे बुरी तरह प्रभावित लोग हैं तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आकर बसे शरणार्थी. बांग्लादेश के बारीसाल से आकर अंडमान के हाथीटापू में आकर बसे लक्ष्मीकांत वैद्य बताते हैं, "ज़मीन से खारापन हटाने में बरसात के कई मौसम लगेंगे. उसके बाद ही किसी तरह की खेती की जा सकेगी. लेकिन तब तक कैसे गुजारा होगा?" द्वीप समूह के दक्षिणी हिस्से के लोगों की परेशानियाँ कुछ ज़्यादा ही गंभीर हैं. हट बे इलाक़े के सोमनाथ बनिक कहते हैं, "हमारे तालाब और कुएँ समुद्री पानी से भर गए हैं. पीने योग्य पानी नहीं बचा है. ऐसे में हमें अपना टापू छोड़ पोर्ट ब्लेयर जाना पड़ेगा." अंडमान से सांसद मनोरंजन भक्त ने स्थिति की गंभीरता के बारे में बीबीसी को बताया, "सबसे बड़ी ज़रूरत है लोगों का पुनर्वास, लेकिन हमें लोगों को बसाने के लिए नई जगहें ढूंढनी होगी. तटीय इलाक़े सुरक्षित नहीं हैं." |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||