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गुरुवार, 07 अप्रैल, 2005 को 16:23 GMT तक के समाचार
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'वहाँ ख़ुशी तो यहाँ ग़म है'

कश्मीर बस
दोस्ती बढ़ाने की एक कोशिश है यह बस सेवा
अपनों पे सितम, ग़ैरों पे करम,
ऐ जाने वफ़ा, ये ज़ुल्म न कर...

श्रीनगर और मुजफ़्फराबाद के बीच भले ही बस सेवा शुरू हो गई हो पर दिल्ली में पिछले पंद्रह वर्षों से शरणार्थी की ज़िंदगी बसर कर रहे सुनील तो सरकार की नीतियों के बारे में कुछ इसी तरह अपने विचार व्यक्त करते हैं.

ऐसा केवल इनका मानना नहीं है, बल्कि उन तमाम कश्मीरी शरणार्थियों की भी लगभग यही धारणा है जो कश्मीर से विस्थापित होकर राजधानी दिल्ली में रह रहे हैं.

इन पंद्रह वर्षों के विस्थापन के बाद दर्द की जो टीस इन शरणार्थियों में नज़र आती है उसे शायद महज़ दो मुल्कों के बीच बस चलाने भर से नहीं ख़त्म किया जा सकता है.

सुनील एक फीकी मुस्कान के साथ हमसे मुख़ातिब होते हैं और कहते हैं, “जिस सरकार ने अपनों को ठोकरें ही दी हैं, वो पता नहीं विदेशियों का क्या करेंगे.”

यह पूछने पर कि क्या दोनों देशों के संबंध सुधरने पर इसका लाभ इन लोगों को नहीं होगा, एक अन्य विस्थापित ने बताया, “हम अपने को आज के कश्मीर में सुरक्षित नहीं पा सकते. आज न तो वहाँ हमारे बच्चों के लिए काम है और न ही हम अपनी जान-माल की रक्षा कर सकते हैं.”

कई कश्मीर पंडितों ने यह सवाल भी उठाया कि दोनों ओर की सरकारों ने कभी भी संबंधों को सुधारने की दिशा में न तो विस्थापित कश्मीरियों को शामिल किया और न ही उनके मुद्दों पर कोई बहस की गई.

मुश्किलें दिल्ली में भी

कई विस्थापितों का कहना था कि दिल्ली में भी उनके साथ सौतेला व्यवहार ही हो रहा है.

क्या ज़रूरत थी...
 यह सिर्फ़ कूटनीतिक प्रयास है. यहाँ हमारे पास खाने को रोटी नहीं है और वहाँ बस पाकिस्तान भेजी जा रही है. सुरक्षा पर काफ़ी पैसा खर्च हो रहा है. जब वाघा बॉर्डर है तो एक नया रास्ता और खोलने की क्या ज़रूरत थी.
कश्मीरी विस्थापित नवीन

उन्होंने बताया, “हमारी दुकानें हटाई जा रही हैं, नई दिल्ली नगर निगम के कर्मचारी हमारी दुकानें तोड़ रहे हैं. वो कहते हैं कि अब बस मुजफ़्फ़राबाद जा रही है, तुम भी जाओ.”

एक अन्य विस्थापित राजेंद्र बताते हैं, “वहाँ खुशी का माहौल है तो यहाँ ग़म का माहौल है.”

एक युवा कश्मीरी विस्थापित नवीन बताते हैं, “यह सिर्फ़ कूटनीतिक प्रयास है. यहाँ हमारे पास खाने को रोटी नहीं है और वहाँ बस पाकिस्तान भेजी जा रही है. सुरक्षा पर काफ़ी पैसा खर्च हो रहा है. जब वाघा बॉर्डर है तो एक नया रास्ता और खोलने की क्या ज़रूरत थी.”

दिल्ली के ग्रीनपार्क क्षेत्र में कश्मीर फूड नाम से एक दुकान चला रहे एके कौल तो काफ़ी क्रोधित होकर कहते हैं, “इस बस से कश्मीरी मुसलमानों, पाकिस्तान या भारत सरकार को तो फ़ायदा हो सकता है पर कश्मीरी पंडितों को इससे कोई लाभ नहीं होने वाला.”

छोटी सी आशा

हालाँकि कुछ लोगों ने इसे एक सकारात्मक पहल माना और उन्होंने इसके लिए दुआएँ भी कीं कि दोनों देशों के बीच स्थाई रूप से अच्छे संबंध स्थापित हो सकें.

कश्मीरी पंडित
शायद कभी कोई इनके दर्द को समझे

ऐसे ही एक कश्मीरी संजय कुमार कहते हैं, “हमें बस से काफ़ी आशाएँ हैं क्योंकि संबंध सुधारने में इसकी एक अहम भूमिका हो सकती है और इससे भविष्य में लाभ मिल सकता है.”

एक अन्य कश्मीरी अशोक कुमार कहते हैं कि इस शुरुआत से भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देशों में ख़ुशी का माहौल है और हमें इस कोशिश को जारी रखना चाहिए.

हाँ, कुछ दुख भी नज़र आता है क्योंकि बहुत से कश्मीरी विस्थापितों का मानना है कि बस चलना तो ठीक है पर उन सारे सवालों का क्या, जिनका पिछले पंद्रह वर्षों से कोई जवाब नहीं मिला है.

श्रीनगर-मुजफ़्फ़राबाद की सड़क पर तो दोनों देशों के संबंधों और दोस्ती की बस दौड़ चली है लेकिन उन यात्रियों का क्या जो आज भी कश्मीरी तो हैं पर विस्थापित, जिनके पास घर लौटने की न तो आस है और न ही रास्ता.

यात्रियों का उत्साहश्रीनगर की तरफ़ से
श्रीनगर से चली बस में यात्रियों का उत्साह देखते ही बनता था.
मुज़फ़्फ़राबाद से श्रीनगर बसमुज़फ़्फ़राबाद से बस
मुज़फ़्फ़राबाद से बस चली तो लोग नियंत्रण रेखा छूने को आतुर थे.
कश्मीर नौजवानकश्मीरी युवाओं की राय
कश्मीरी नौजवान क्या सोचते हैं श्रीनगर-मुज़फ़्फ़राबाद बस के बारे में.
सफ़र की तैयारी
श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद बस सेवा के लिए की गई तैयारियों की तस्वीरें.
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