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एक साफ़, बेलौस, दो-टूक जनादेश

बिहार में मतदान
बिहार की जनता ने सत्ता की चाभी लालू के हाथ से छीन नीतिश को सौंप दी
बिहारवासी इस बार छले जाने को तैयार नहीं थे. इसी साल के शुरू में जो जनादेश मिल था वह भी उतना अस्पष्ट नहीं था, जितना उसे बताने की कोशिश की गई.

लेकिन उसके इंगित की जानबूझकर अवहेलना की गई. उस बार भी संकेत था कि बिहार की जनता बदलाव चाहती है और 15 वर्ष तक झेल लेने के बाद लालू से अब उसका भरोसा उठ गया है. बूटा सिंह और शिवराज पाटिल से लेकर वामपंथी दलों तक ने जनता की इस इच्छा की अनदेखी की थी.

लिहाज़ा इस बार बिहार के लोगों ने साफ़, बेलौस और दो-टूक फ़ैसला सुना दिया है जिसके बाद किसी तरह के संशय विभ्रम और अगर-मगर की गुंजाईश ही नहीं रही.

मायने

इस जनादेश की व्याप्तियाँ बहुत गहरी हैं. सामाजिक संरचना के नज़रिए से नीतिश कुमार का बिहार कई मायनों में लालू प्रसाद के बिहार से बिल्कुल विपरीत ध्रुव पर खड़ा होने की तैयारी कर रहा है.

 मुस्लिम मतदाताओं ने गठबंधन के वरीय हिस्सेदार जेडी यू में अपना भरोसा जताया है और भाजपा को लेकर जो भी संशय उनके मन में रहे होंगे उन्हें फ़िलवक़्त स्थगित रखना ही उन्होंने पसंद किया है

पिछड़ों में भी नितांत पिछड़े और दलितों में भी नितांत दलित अब अपनी अलग पहचान बनाने पर आमादा हैं. इस तबके के साथ कथित ऊँची सवर्ण जातियों का भरपूर सहयोग भी नीतिश की स्थिति को मज़बूत आधार दे रहा है.

ऊँची सवर्ण जातियाँ काफ़ी हद तक भाजपा ने गठबंधन के लिए जुटाई हैं. दूसरी ओर लालू का यादव-मुस्लिम सहकार काफ़ी हद तक दरका है. मुस्लिम मतदाताओं ने गठबंधन के वरीय हिस्सेदार जेडी यू में अपना भरोसा जताया है और भाजपा को लेकर जो भी संशय उनके मन में रहे होंगे उन्हें फ़िलवक़्त स्थगित रखना ही उन्होंने पसंद किया है.

यह एक विचित्र तरह का तालमेल है जिसमें सामाजिक सरोकारों की नई व्याख्या संभव हैं. ऐसा हो पाया तो वह अपने आप में एक दिलचस्प परिवर्तन भरी बात होगी.

बाहुबली

नीतिश कुमार और भाजपा ने स्पष्ट बहुमत तो प्राप्त कर लिया है मगर इसमें कई तरह के भीतरी पेंच भी हैं. साफ़ सुथरी राजनीति के हामी रहे नीतीश को भी इस चुनाव में 37 बाहुबलियों को भी टिकट देनी पड़ी जिनमें 31 जीतकर भी आ गए हैं. भाजपा ने 19 बाहुबलियों को उम्मीदवार बनाया था जिनमें सिर्फ़ 2 जीत पाए. इस तरह जेडीयू-भाजपा तालमेल के 33 बाहुबलियों ने बिहार विधानसभा की सदस्यता हासिल कर ली है.

 साफ़ सुथरी राजनीति के हामी रहे नीतीश को भी इस चुनाव में 37 बाहुबलियों को भी टिकट देनी पड़ी जिनमें 31 जीतकर भी आ गए हैं

वैसे इस हमाम में दूसरे दल भी नंगे हैं. आरजेडी ने 46 बाहुबलियों को उम्मीदवार बनाया उनमें से 18 जीतकर आए हैं. रामविलास पासवान की पार्टी ने 39 बाहुबलियों को अपनाया था जिनमें सिर्फ़ चार ही विधानसभा का मुख देख सके.

इसी तरह रामविलास पासवान की नीतियों से भड़के हुए बागी विधायकों में से 13 ने जेडी यू के साथ हाथ मिला लिया था जिनमें से 10 चुनाव जीतकर सदन में आ गए हैं. ऐसे दो विधायकों ने भाजपा की सदस्यता स्वीकार कर ली थी उनमें से एक विजयी रहा. निर्दलीय की संख्या भी अच्छी ख़ासी है मगर वे स्पष्ट बहुमत के आगे विवश हैं. उनकी ज़रूरत किसी को नहीं.

बेबाक जनादेश

जो लोग वोट प्रतिशत को सीटों की जीत से कम महत्वपूर्ण नहीं मानते, उनके लिए भी आँकड़ों का खेल कम दिलचस्प नहीं.

 चुनावी नतीजों ने यह बात साफ़ कर दी है कि चाहे सवाल सीटों का हो या मत प्रतिशत का जनादेश बेबाक है

जेडीयू-भाजपा को 35.8 प्रतिशत मिले हैं जो पिछली बार से 10.3 प्रतिशत अधिक हैं. राजद को 31.1 प्रतिशत मत मिले जो पिछली बार से 0.6 प्रतिशत कम हैं.

इस तरह चुनावी नतीजों ने यह बात साफ़ कर दी है कि चाहे सवाल सीटों का हो या मत प्रतिशत का जनादेश बेबाक है.

15 सालों से चल रहे लालू-राबड़ी राज्य का यह समापन नीतीश कुमार के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों लाया है जिसे नीतिश और भाजपाई नेता ‘जंगल राज’ कहते नहीं थकते थे उसे एक साफ़-सुथरी क़ानून-व्यवस्था के दायरे में लाने की कशमकश को पहली चुनौती के रूप में उठाते हुए भी नीतीश आज यह कहने से नहीं चूके ‘हम बदले की राजनीति नहीं करेंगे.’

(लेखक ‘दिनमान’ और ‘स्वतंत्र भारत’ के पूर्व प्रधान संपादक हैं)

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