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शुक्रवार, 21 अक्तूबर, 2005 को 16:12 GMT तक के समाचार
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बड़े राजनीतिक दलों का छोटा गणित

सोनिया गांधी और लालू प्रसाद
काँग्रेस और भाजपा ने बिहार के चुनावों में ख़ुद को दोयम हैसियत पर रखा है.
यह महज़ इत्तेफ़ाक नहीं है कि देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों, काँग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बिहार के चुनावों में ख़ुद को दोयम हैसियत पर रखना मंज़ूर कर रखा है.

लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले धड़े राष्ट्रीय जनता दल की सहयोगी पार्टियाँ है काँग्रेस पार्टी और नीतिश कुमार के नेतृत्व वाले धड़े की अनुगामिनी है भाजपा.

ये दोनों मुख्य मुक़ाबले वाले दल अपने-अपने अहम का विसर्जन करके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और जनता दल (यू) की छाया तले पनपने के अवसर तलाश कर रहे हैं.

आज से 10-12 वर्ष पहले तक यह एक असंभव सी बात ही मानी जाती है कि महाबली काँग्रेस का ऐसा पराभव हो जाएगा कि यह लालू के फेंके हुए टुकड़ों पर अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश करेगी और भाजपा को कभी नीतिश कुमार की छत्रछाया में बैठकर ही अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़नी होगी, यह भी सोच पाना कठिन था.

लेकिन पिछले दो दशकों में बिहार की राजनीतिक वास्तविकताएँ कितनी तेज़ी से बदली हैं, इसका प्रमाण देते हैं बिहार में हो रहे चुनाव, जहाँ राजनीतिक दलों को परमुखापेक्षी होकर छोटे-छोटे गणित का सहारा लेना पड़ रहा है.

वाम के दाम

दोनों ही वामपंथी दलों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के बीच जो सोच की दरार दिखाई पड़ रही है वह भी सिद्धांतों की ज़मीन पर नहीं बल्कि चुनावी फ़ायदे के लिए की गई सौदेबाज़ी का अंजाम ज़्यादा मालूम पड़ती है.

माकपा ने जहाँ लालू का दामन थामा है वहीं भाकपा ने रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के साथ मिलकर लालू और नीतिश के बीच हो रहे संघर्ष को एक तीसरा आयाम देने की कोशिश की.

दरअसल दोनों बड़े राजनीतिक दलों यानी काँग्रेस, भाजपा और सिद्धांतों का कवच ओढ़ने वाली माकपा, भाकपा ने खुलकर अपने को इस या उस जातीय समीकरण के साथ जोड़ा है.

मज़े की बात ये है कि यादव, कुर्मी, मुसलमान और अन्य जातियाँ अब पहले की तरह थोक वोट किसी को नहीं देंती.

 न लालू दावा कर सकते हैं कि सारे यादव मत उनकी गिरफ़्त में है, न कुर्मियों और यादवों से अलग पिछड़ी जातियों ने नीतिश का ही साथ देने की क़सम खाई है. न दलित वोट बैंक पासवान की पूँजी है और न मुस्लिम मत एक ही जगह गिरने वाले हैं.

न लालू दावा कर सकते हैं कि सारे यादव मत उनकी गिरफ़्त में है, न कुर्मियों और यादवों से अलग पिछड़ी जातियों ने नीतिश का ही साथ देने की क़सम खाई है. न दलित वोट बैंक पासवान की पूँजी है और न मुस्लिम मत एक ही जगह गिरने वाले हैं.

अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र में एक ही जाति के लोग अलग तरह से मतदान कर सकते हैं और मुस्लिम मत तो पिछले चुनाव से ही बँटकर गिरने लगा है.

इस बार भी ऐसा ही होगा, ऐसा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में कहा गया है.

कहा गया है कि जातीय मतों की व्यापक ‘क्रॉस वोटिंग’ होनी तय है.

जनादेश किसे

शुरूआती मतदान के बाद मतदाताओं की रायशुमारी के जो संकेत मिल रहे है उनमें फिर से खंडित जनादेश की बात की जा रही है.

ऐसे में लालू-नीतिश जैसे क्षेत्रीय ख़लीफ़ाओं पर जो बीतेगी वह तो बाद की बात है, दिल्ली की नींद अभी से हराम होने लगी है.

बिहार में एनडीए के कार्यकर्ता
बिहार विधानसभा को भंग करने के निर्णय की पृष्ठभूमि में भाजपा के लिए तो यह चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए हैं.

फिर खंडित जनादेश का अर्थ है कि दिल्ली को यह मानना होगा कि राज्यपाल के साथ मिलकर केंद्र ने ‘ज़रूरत से ज़्यादा जल्दबाज़ी’ दिखाकर एक ग़रीब और साधनहीन राज्य को फिर से भारी ख़र्चों वाली चुनावी आग में झोंक दिया और नतीजतन फिर से लालू-राबड़ी को गद्दी सौंपने के लिए संभवतः उसी राज्यपाल की मदद लेनी होगी और वह भी तब, जब कम से कम लालू-काँग्रेस-माकपा विधानसभा में पाँच-सात सीटों के ही अंतर से हों, सबसे बड़े विधायक समूह के रूप में उभरे.

विकल्प ये है कि यदि जद (यू) और भाजपा अपेक्षाकृत बड़े समूह के रूप में उभरते हैं तब कड़वा घूँट पीकर उन्हें सरकार बनाने देना ही होगा.

बिहार विधानसभा को भंग करने के सवाल पर भाजपा ने जिस तरह का राष्ट्रव्यापी मोर्चा खोला था, उसे देखते हुए उनके लिए भी यह प्रतिष्ठा और मान-अपमान से जुड़ा हुआ सवाल है.

यदि बूटा सिंह और उनकी सिफ़ारिश पर अमल करने वाली केंद्र सरकार सही साबित होती है तो पहले से भीतरी और बाहरी दबावों तले कराहती भाजपा पर यक़ीनन बोझ कुछ और ज़्यादा बढ़ जाएगा.

(लेखक दिनमान और स्वतंत्र भारत के पूर्व मुख्य संपादक रहे हैं)

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