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किसके वोट बैंक हैं ये बिहारी? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली की सीमापर स्थित उत्तरप्रदेश की वैशाली, वसुंधरा और दूसरी कालोनियों की साप्ताहिक मंडियों में करीब-करीब एक सा नज़ारा होता है. तमाम नौकरीपेशा लोग देर रात तक सब्ज़ी से लेकर तमाम घरेलू सामान खरीदते दिख जाते हैं. गैस से चलने वाले लैंप की रोशनी में एक और ख़ास बात जो नज़र आती है वह यह कि यहाँ आने वाले तमाम खरीदारों और दुकानदारों में ज़्यादातर बिहार से यहां आकर बसे लोग हैं. जिन्हें बोलचाल की भाषा में बिहारी कहा जाता है. मैथिली, मगधी और भोजपुरी में संवाद और तकरार करते लोगों को देख एकबारगी लगता है जैसे बिहार उठकर यहां चला आया हो. समझ पाना मुश्किल है कि यह बिहार का दर्द है या बिहारियों की जीवटता. ऐसे समय जब बिहार में एक और चुनाव हो रहे हैं ये बिहारी यहां रोज़ की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं. और यह सिर्फ़ दिल्ली और इसके आसपास के इलाक़ों का दृश्य नहीं है. यही दृश्य मुंबई जैसे महानगर में भी आसानी से देखा जा सकता है. किस्तों में विस्थापित हो रहे इन लोगों की न तो बिहार के चुनाव में कोई सीधी भागीदारी है और न ही वहां के नेताओं को उनकी फ़िक्र. यह भी कम दिलचस्प नहीं कि जब बिहार में 13 नवंबर को होने वाले तीसरे दौर के मतदान की तैयारी हो रही होगी, तब ये ठसाठस भरी ट्रेनों में छठ पूजा के लिए अपने घर जा रहे होंगे. आख़िर ये किसके "वोट बैंक" हैं? कितने विस्थापित? दरअसल बीते डेढ़ दो दशकों में दूसरे तमाम शहरों की तरह दिल्ली का भी विस्तार हुआ है. इससे सटे नोएडा, गाज़ियाबाद, गुड़गांव, फ़रीदाबाद जैसे शहरों में भी यह बदलाव देखा जा सकता है. इस विस्तार के लिए देश भर के शहरों और गांवों से काम की तलाश में यहां आने वाले लोग जिम्मेदार हैं.
इसमें एक बड़ा हिस्सा बिहार का है. यदि ग़ैरसरकारी और अन्य स्रोतों के आंकड़ों पर यकीन करें तो दिल्ली की आबादी का पांचवा हिस्सा बिहारियों का है. ( इस तरह के सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.) इस तरह देखा जाए तो 2001 की जनगणना के मुताबिक़ दिल्ली की आबादी 1 करोड़ 37 लाख के क़रीब है और इसमें 27 लाख से अधिक बिहारी हैं. अब ज़रा बिहार की आबादी से इसकी तुलना कीजिए. 2001 में बिहार की आबादी थी, 8 करोड़ 28 लाख 78 हजार. इस तरह मोटे तौर पर नजर आता है कि बिहार के साढ़े तीन फीसदी लोग तो अकेले दिल्ली में आ बसे हैं. इसके अलावा मुंबई और कोलकाता के साथ ही पंजाब और हरियाणा में भी बड़ी संख्या में बिहारी रोज़ी रोटी की तलाश में जा बसे हैं. वह रिक्शा चलाने और खोमचे-ठेले में सब्जियां बेचने से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों तक में छाए हुए हैं.
इस तरह यदि दिल्ली के आंकड़ों की तरह देश के दूसरे शहरों में विस्थापित हो रहे बिहारियों की आबादी पर गौर करें तो यह बिहार की मौजूदा आबादी की तुलना में 12-13 फ़ीसदी तक बैठती है. यदि इसे दस फ़ीसदी भी मान लिया जाए तब भी यह आंकड़ा चौंकाने वाला है. दस फीसदी का मतलब है 82 लाख. यह संख्या बिहार से अलग हुए झारखंड और उससे सटे छत्तीसगढ़ की आबादी के आधे से थोड़ा कम है. यही नहीं, यह हिमाचल और उत्तरांचल समेत करीब दस राज्यों की आबादी से भी ज़्यादा है. हरित क्रांति से ध्वस्त सपनों तक आँकड़े बताते हैं कि दस से पंद्रह सालों में पलायन बढ़ा है. वैसे 1970 के दशक में पंजाब और हरियाणा में हरित क्रांति के दौर में बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और मध्यप्रदेश से जमकर पलायन हुआ. इनमें भी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग ज्यादा थे. वजह, ये सस्ते खेतिहर मजदूर थे. बाद के दशकों में हसीन सपने लेकर दिल्ली और मुंबई जाने वाले युवकों की संख्या बढ़ गई. बेशक इनमें से कई ऊंचों पदों पर बैठे हैं. लेकिन ऊंचे सपने लेकर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर की राह पकड़ने वाले न जाने कितने लोग "बिहारी" और "भइया" बनकर रह गए. इस विस्थापन का कोई एक कारण नहीं है. पर अब जो लोग आ रहे हैं, उनमें अधिकांश युवा हैं और ज़ाहिर तौर पर वे काम और बेहतर शिक्षा के लिए आ रहे हैं. सालों पहले बिहार से दिल्ली में आ बसे और अब कांग्रेस के विधायक महाबल मिश्रा भी मानते हैं कि बिहार की बदहाली ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिया. वे कहते हैं, "बिहार में भी कोई नोएडा और फ़रीदाबाद हो जाए तो लोग बाहर क्यों निकलेंगे." मिश्रा की बात पर यकीन करें तो हर साल बिहार से दो से तीन लाख लोग रोजी रोटी की तलाश में बिहार से बाहर चले जाते हैं. उनके मुताबिक अभी कम से कम एक करोड़ बिहारी बिहार से बाहर हैं. हालांकि इस पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है कि वास्तव में किसे विस्थापित माना जाए. आँकड़ा और मुद्दा पर यह मुद्दा नहीं है. बिहार का हाल जानना हो तो वहां से आने और जाने वाली ट्रेनों का नजारा देखा जा सकता है.
पिछले साल इन्हीं दिनों दिल्ली रेलवे स्टेशन में जनसाधारण एक्सप्रेस के छूटने के समय मची भगदड़ में पांच लोग मारे गए थे. लेकिन, कुछ घंटे बाद ही यह ट्रेन रवाना हो गई और सब कुछ जैसे सामान्य हो गया. वहां जाने वाली ट्रेनें आज भी ठसाठस हैं. यह स्थिति तब है जब पिछले डेढ़ दशक में बिहार ने सबसे ज्यादा रेल मंत्री दिए. बिहार विधानसभा चुनाव में जिन तीन दिग्गजों लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान की किस्मत दांव पर हैं, वे रेल मंत्री रह चुके हैं. लालू प्रसाद तो अब भी रेलमंत्री हैं. लेकिन, इन तीनों के लिए जैसे यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. यह आंकड़े नहीं महत्वपूर्ण सूचनाएँ हैं कि बिहार देश का सबसे पिछड़ा राज्य है, वहां प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है. 42.3 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. लेकिन क्या बिहार के राजनीतिक क्या इन आँकड़ों को सुन-पढ़ रहे हैं. |
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