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'विधानसभा भंग करना असंवैधानिक था' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तेइस मई को विधानसभा भंग करने का जो फ़ैसला लिया गया था उसकी वजह यह थी कि नीतिश कुमार के पास 135 विधायकों का समर्थन था. जब ये विधायक राष्ट्रपति के पास गए तो साफ़ हो गया था कि कितने विधायक थे. राज्यपाल ने विधानसभा को भंग करने की जो सिफ़ारिश की थी उसके पीछे का पू मकसद यह था कि किसी तरह से एनडीए की सरकार न बन पाए. एक रिपोर्ट में तो उन्होंने यह तक कह डाला था कि अगर एनडीए की सरकार बनती है तो इससे राजद विधायकों को तकलीफ़ हो सकती है. यह बिहार में लोकतंत्र के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक षडयंत्र था. बिहार की जनता ने एक नई सरकार के लिए वोट दिया था और उस नई सरकार को न बनने दिया जाए, यह उसका षडयंत्र था. अभी जो सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया है, उसका हम स्वागत करते हैं. स्वतंत्र भारत में इस तरह के उदाहरण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं जिसमें धारा 356 के तहत लिए गए निर्णयों को सुप्रीम कोर्ट ग़ैरसंवैधानिक क़रार दिया हो. इसके बाद यह साफ़ हो गया है कि बिहार की जनता पर असमय चुनाव थोपकर जो अन्याय किया गया है उसपर अब एक संवैधानिक निर्णय की भी छाप लग गई है. इस फ़ैसले से सवाल केवल राज्यपाल पर ही नहीं उठे हैं. इसमें राज्यपाल के अलावा केंद्र सरकार और राजद अध्यक्ष की भी ज़िम्मेदारी बनती है. लोकतंत्र के ख़िलाफ़ जो षडयंत्र था, उसमें ये सब शामिल थे. यह नहीं भूलना चाहिए कि आधी रात को यह फ़ैसला कैबिनेट की बैठक में लिया गया था. अब बिहार की जनता को इस पर अपना निर्णय सुनना चाहिए. |
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