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एक बार फिर त्रिकोणीय चुनावी दंगल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाँच करोड़ बारह लाख मतदाताओं वाले राज्य बिहार में 243 सीटों वाली विधानसभा के लिए जारी चुनाव प्रक्रिया इस वर्ष नवम्बर के अंतिम सप्ताह में संपन्न होगी. राज्य की 13वीं विधानसभा के लिए इसी साल के आरंभ में हुए चुनाव राजनीतिक मकड़जाल में फंस कर बेकार नहीं हुए होते तो एक साल के भीतर दोबारा चुनाव की नौबत नहीं आती. भंग हुई उस त्रिशंकु विधानसभा के बाद यहाँ राष्ट्रपति शासन वाले राज्यपाल सरदार बूटा सिंह से लेकर सर्वोच्च अदालत तक चर्चित वैध-अवैध कार्रवाई वाली बहस में उलझे रहे नेता-मतदाता. क्या दोष सिर्फ़ खंडित जनादेश का है? सोच में पड़ गए न आप भी? तो छोड़िए इस विवाद को और बात करते हैं बिहार के मौजूदा चुनावी गणित की. इस संदर्भ में यहाँ राजनीति के शीर्ष पर तीन बड़े नेता हैं राष्ट्रीय जनता दल(आरजेडी) के लालू प्रसाद यादव, जनता दल युनाइटेड(जेडीयू) के नीतीश कुमार और लोकजनशक्ति पार्टी(एलजेपी) के रामविलास पासवान. इन तीनों के अलग-अलग दलीय गठबंधन हैं और मुख्य रूप से मुक़ाबला भी इन्हीं के त्रिकोण पर केंद्रित है. गठबंधन में नयापन वैसे मौटे तौर पर तो पिछले विधानसभा चुनाव के समय बने गठबंधन की तुलना में इस बार बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिखता है. लेकिन जो भी थोड़ा नयापन है वह दरअसल है बड़ा ग़ौरतलब.
जैसे कि काँग्रेस, राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी(एनसीपी) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट(सीपीएम) पार्टी इस बार खुलकर और पूर्णतः आरजेडी के साथ चुनावी तालमेल को तैयार हो गए. इसलिए आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भी पिछले चुनाव में हुए नुकसान का दबाव महसूस करते हुए अपने सहयोगी दलों के लिए कुछ ज़्यादा सीटें छोड़ दीं. हालाँकि फिर भी एक सीट पर सीपीएम के साथ और दूसरी एक सीट पर काँग्रेस के साथ आरजेडी का 'दोस्ताना संघर्ष' हो रहा है. आरजेडी-176, काँग्रेस-51, एनसीपी-8 और सीपीएम-9 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. पिछले चुनाव में आरजेडी ने 215 और काँग्रेस ने 83 विधानसभा क्षेत्रों में अपने उममीदवार उतारे थे. तो मतलब साफ़ है कि इस बार आरजेडी ने कथित धर्मनिरपेक्ष मतों में बिखराव रोकने की कोशिश की है. लेकिन इस कोशिश पर कहर बन कर टूटने की आशंका बढ़ाने वाला एलजेपी-सीपीआई गठबंधन एक ऐसा तिकोन बना है, जहाँ लालू प्रसाद के बहुचर्चित सूत्र एम-वाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से मुस्लिम मतों का टूटना लगभग तय माना जा रहा है. एनडीए का हौसला पिछले चुनाव में आरजेडी को 75 सीटों पर सीमित कर देने का एक बड़ा कारण बनी एलजेपी ने इस बार काँग्रेस गठबंधन से अलग होकर सीपीआई के साथ चुनावी तालमेल कर लिया है.
यानी केंद्र सरकार में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के ये दोनों सहयोगी दल आरजेडी-काँग्रेस को भी एनडीए के बराबर यहाँ राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मान चुके हैं. एलजेपी 205 सीटों पर और सीपीआई 35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. उधर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी- ये सब स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में हैं और आरजेडी या बीजेपी दोनों के ख़िलाफ़ वोट माँगते हैं. कथित सेक्युलर मतों के इस बिखराव ने एनडीए का हौसला बढ़ा दिया है. बीजेपी-जेडीयू गठबंधन अपनी दूसरी बड़ी ताक़त इस बात में मान रहा है कि नीतीश कुमार को इस गठबंधन की तरफ से भावी मुख्यमंत्री घोषित किए जाने का अनुकूल असर आम जनमानस पर पड़ रहा है. वजह यह बताई जा रही है कि विगत 15 वर्षों के लालू-राबड़ी शासन काल में बिहार के अवरूद्ध विकास और बढ़ते अपराध से क्षुब्ध आम मतदाताओं का रूझान नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले विकल्प की तरफ होना स्वाभाविक है. दूसरी तरफ आरजेडी-काँग्रेस गठबंधन का अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि जिस सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सदभाव को लालू-राबड़ी शासनकाल में मज़बूत बनाया गया, उस पर एनडीए एक बड़ा खतरा बन जाएगा अगर उसकी सरकार यहाँ बनी. आरजेडी-काँग्रेस गठबंधन को यह भी उम्मीद है कि इस बार यादव और मुसलमान पिछले विधानसभा चुनाव वाली ढिलाई या आरजेडी के प्रति उदासीनता छोड़कर पुरानी एकजुटता दिखाएंगे. उधर 141 सीटों पर अपना प्रत्याशी देने वाली पार्टी जेडीयू और 102 सीटों पर उम्मीदवारी के साथ चुनावी मैदान में उतरी बीजेपी का आपसी चुनावी तालमेल पिछले चुनाव के मुक़ाबले ज़्यादा मज़बूत दिखता है. कारण यह भी है कि 13वीं विधानसभा भंग करने के संबंध में राज्यपाल बूटा सिंह और केंद्र सरकार की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय की सख़्त और प्रतिकूल टिप्पणी से एनडीए के इन दोनों घटक दलों में मिलजुलकर चुनावी बेड़ा पार लगाने की ललक बहुत बढ़ गई है. चुनाव आयोग की भूमिका चुनाव मे भारी हिंसा, धाँधली, प्रशासनिक पक्षपात और अन्य तमाम तरह की गड़बड़ियों के लिए 'कुख्यात' हो चुके बिहार में ठीक से मतदान करा लेना चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी और बेहद कठिन चुनौती तो है ही. इसलिए चुनाव आयोग ने इस बाबत केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों की 600 कंपनियों यानी 60 हज़ार जवानों की तैनाती, कथित दागी या पक्षपातपूर्ण रवैए वाले प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का बड़े पैमाने पर तबादला वग़ैरह कुछ ऐसे सख़्त क़दम उठाए हैं, जिन्हें अभूतपूर्व माना जा रहा है. नवम्बर के अंतिम सप्ताह में राज्य की विधानसभा और राज्य की नई सरकार के गठन को फिर कोई ग्रहण न लगे, इस उम्मीद के साथ यहाँ चुनाव प्रचार अभियान में नेतागण जुटे हुए हैं. लेकिन यहाँ मतदाताओं में से अधिकांश के मन में बार-बार के चुनावी चक्कर से उपजी उकताहट, खीज और उदासीनता भी साफ़ तौर पर झलक उठती है. |
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