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'कोर्ट में हराया, वोट में भी हराएंगे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना की थी कि भंग विधानसभा को बहाल किया जाए और विधानसभा चुनावों पर रोक लगाई जाए लेकिन इन दोनों मांगों को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने न तो भंग विधानसभा को बहाल करने को कहा है और न ही चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने का निर्देश दिया है. इससे साफ़ होता है कि जो प्रक्रिया चल रही है वो चलती रहे और वो जायज़ है. अब कुछ लोग इसे इस तरह बता रहे हैं कि फ़ैसले में विधानसभा भंग को असंवैधानिक ठहराया गया है. यह तो चर्चा का विषय है, सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला यह रहता कि विधानसभा भंग का फ़ैसला असंवैधानिक है तब तो विधानसभा फिर से बहाल हो जाती. ऐसा फ़ैसले में नहीं है, यह तो विपक्ष की माँग थी. पर फ़ैसले में न तो विधानसभा को बहाल करने की बात कही गई है और न ही चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगी है तो फिर इसे असंवैधानिक कैसे कहा जा सकता है. मोटे तौर पर देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष की माँग को ख़ारिज कर दिया है. वही विधानसभा फिर से बहाल हो जाए, इसको सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया है. इसके लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है. सरकार का इस फ़ैसले से कुछ लेना-देना नहीं है. विपक्षी दल बिना किसी सोच समझ के और बिना फ़ैसले को पढ़े टिप्पणी कर रहे हैं. इससे कोई फ़र्क पड़नेवाला नहीं है और इसे गंभीरता से लेने कि ज़रूरत नहीं है. यह एक क़ानूनी लड़ाई थी और इसमें विपक्षी दल हार गए हैं. अभी ये लोग कोर्ट में हारे हैं और अब वोट की लड़ाई में भी हारेंगे. (पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित) |
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