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शनिवार, 15 अक्तूबर, 2005 को 12:59 GMT तक के समाचार
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बिहार यूपीए के लिए कठिन चुनौती

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के लिए परीक्षा की घड़ी
लगभग डेढ़ साल पहले सत्ता में आई केंद्र की यूपीए सरकार के लिए पहले दिन से ही बिहार सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में उभरा है. और आने वाले दिनों में ये राज्य सत्ताधारी गठबंधन के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है.

अभी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में मंत्रिमंडल ने शपथ भी ग्रहण नहीं की थी कि कांग्रेस के सबसे विश्वस्त और पुराने गठबंधन सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद और लोकजनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के बीच रेल मंत्रालय पाने को लेकर मची होड़ ने ऐसी गंभीर स्थिति पैदा कर दी कि पासवान ने मंत्री पद की शपथ न लेने तक की धमकी दे दी.

मज़बूत अंकगणित के आधार पर लालू प्रसाद ने रेल मंत्रालय तो पाया ही साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे अनुभवी नेताओं के मनाने पर पासवान रसायन मंत्रालय लेने पर राज़ी हो गए.

यूपीए ने उस समय तो बिहार से उपजे इस संकट को सुलझा लिया, लेकिन लालू और पासवान के रिश्ते लगातार बिगड़ते गए.

लालू और पासवान

पिछले साल दिसंबर में जिस तरह इन दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, उससे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साफ़ छवि को पहला गहरा धक्का लगा. बिगड़े हालात संभालने के लिए प्रधानमंत्री को लालू और पासवान को अलग-अलग प्रधानमंत्री कार्यालय बुलाकर चुप रहने के निर्देश दिए.

काँग्रेस सूत्रों के अनुसार उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रामविलास पासवान से साफ़-साफ़ कह दिया था कि गठबंधन सरकार में अंकगणित की बड़ी भूमिका होती है और 24 सांसदों वाले लालू प्रसाद को वो नाराज़ नहीं करना चाहते. वर्ष 2005 आते-आते बिहार विधानसभा चुनावों की सरगर्मियाँ पूरे ज़ोरों पर थी.

लालू और पासवान के मतभेद लगातार बने रहे हैं

लोकसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में तमाम सर्वेक्षणों के विपरीत काँग्रेस-एनसीपी गठबंधन को मिली जीत से उत्साहित और भारतीय जनता पार्टी की अंदरुनी कल्ह का फ़ायदा उठाने की फ़िराक में कांग्रेस ने बिहार विधानसभा चुनाव में उस राज्य में खोए जनाधार को वापिस पाने के एक सुनहरे मौके के रूप में देखा.

दूसरी तरफ़ लालू प्रसाद और रामविलास पासवान का अलग-अलग चुनाव लड़ना तो तय था ही. काँग्रेस ने अर्जुन सिंह और आरके धवन जैसे वरिष्ठ नेताओं को बिहार में गठबंधन की रणनीति तय करने की ज़िम्मेदारी सौंपी.

कई दिनों तक लालू प्रसाद के साथ चली सीटों के तालमेल पर बातचीत किसी सिरे नहीं चढ़ पाई. इसका मूल कारण था लालू प्रसाद द्वारा काँग्रेस को कम सीटें देना.

लालू प्रसाद के साथ बातचीत विफल होने के बाद रामविलास पासवान ने काँग्रेस को उनकी लोकजनशक्ति के साथ चुनाव लड़ने का निमंत्रण दिया, जिसे काँग्रेस ने स्वीकार भी कर लिया. पिछले साल मई में हुए लोकसभा चुनावों में एक साथ चुनाव लड़े राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति, काँग्रेस और वामदलों का गठबंधन फरवरी विधानसभा चुनावों में पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया.

एकजुट एनडीए का सामना

दूसरी तरफ विपक्षी एनडीए के दोनों घटक जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी चुनावों से कई महीने पहले से ही अपना प्रचार प्रभावशाली ढंग से चला रहे थे. 27 फरवरी को घोषित किए गए चुनाव परिणामों में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़े दल के रूप में और एनडीए सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरा.

करीब दो सप्ताह इंतज़ार करने के बाद राज्यपाल बूटा सिंह ने राज्य विधानसभा को स्थगित रखने और राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश की.

नीतीश की अगुआई में जद(यू) और भाजपा इस बार भी एकजुट है

यूपीए के कई नेताओं द्वारा राज्य में सरकार गठन के लिए पासवान को मनाने की सभी कोशिशें बेकार साबित हुईं, क्योंकि पासवान बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा से पीछे नहीं हटे.

दूसरी तरफ़ पासवान सरकार गठन के लिए जनता दल यूनाईटेड से भी लगातार सरकार गठन के लिए संपर्क में रहे.

आख़िर तीन महीने की खामोशी के बाद एनडीए ने पासवान के 29 में से 18 विधायकों को अपनी तरफ़ करने में सफलता प्राप्त कर ली. इससे पहले कि एनडीए सरकार बनाने का दावा पेश करता राज्यपाल बूटा सिंह की सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार ने विधानसभा भंग कर दोबारा विधानसभा चुनाव करवाने का फ़ैसला किया.

एनडीए के कुछ विधायकों ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और ताज़ा विधानसभा चुनावों के पहले चरण के मतदान से ठीक 10 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को असंवैधानिक घोषित कर केंद्र सरकार को करारा झटका दिया.

यूपीए और ख़ासतौर पर लालू प्रसाद के लिए संतोष की बात सिर्फ़ इतनी है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों पर रोक नहीं लगाई.

कड़ा मुक़ाबला

इस बार भी रामविलास पासवान ने यूपीए से अलग चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया और काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी सहित गठबंधन के किसी भी नेता की अपील नहीं मानी.

एक तरफ खंडित यूपीए गठबंधन और दूसरी तरफ कई वर्षों से एकजुट एनडीए के बीच जबर्दस्त टक्कर के आसार दिख रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए विपरीत निर्णय और बिहार के दोनों यूपीए नेताओं को एक मंच पर न ला पाना आने वाले दिनों में केंद्र के सत्ताधारी गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा सकता है.

अंदरूनी कलह से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी बिहार चुनावों पर नज़रे लगाए हुए है. क्योंकि पार्टी नेताओं का मानना है कि अगर इस बार एनडीए बहुमत पा लेता है तो पार्टी की अंदरुनी मुश्किलों से ध्यान हटाने में सफलता मिल सकती है. साथ ही कमज़ोर भाजपा सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को भी अपनी जीत के रूप में देख रही है.

यहाँ तक कि अपनी पार्टी अध्यक्षता बचाने में लगे लालकृष्ण आडवाणी डेढ़ साल में पहली बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की माँग करने की हिम्मत जुटा पाए.

बिहार विधानसभा चुनावों के परीणाम क्या होंगे यह तो समय ही बताएगा, लेकिन यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह पहली असली राजनीतिक परीक्षा होगी.

66बिहार चुनाव कार्यक्रम
बिहार विधानसभा चुनाव चार चरणों में कराया जा रहा है. प्रस्तुत है पूर्ण कार्यक्रम-
66आयोग ने किए उपाय
चुनाव आयोग ने बिहार में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए कई क़दम उठाए हैं.
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