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रविवार, 16 अक्तूबर, 2005 को 14:05 GMT तक के समाचार
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बिहार में इतिहास दोहराया जाएगा?

लालू प्रसाद यादव
लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ नाराज़गी पिछली बार के नतीजों में दिखी थी
बिहार फिर चुनाव झेल रहा है. विधानसभा चुनाव के बाद नवगठित सदन की बैठक हुए बग़ैर दोबारा चुनाव की यह पहली घटना है.

इन बीते सात महीनों में काँग्रेस के लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) का दामन छोड़कर पूरी तरह राष्ट्रीय जनता दल के साथ होने के अलावा प्रदेश के राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों में कोई ख़ास बदलाव नहीं दर्ज हुआ है.

फरवरी के चुनाव में काँग्रेस 'दो नावों पर सवार' थी. तब वह न तो एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान को नाराज़ करना चाहती थी और न ही राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से दुश्मनी मोल लेने का जोख़िम उठाना चाहती थी.

कुल मिलाकर बिहार और पड़ोसी राज्य झारखंड के मामले में वह पूरी तरह दिग्भ्रमित थी.

चुनाव परिणाम के बाद उसे इसका खामियाज़ा भी भुगतना पड़ा. झारखंड जहाँ एक ग़ैर भाजपा सरकार के गठन की पूरी संभावना थी, काँग्रेस अपनी झोली में आई सत्ता गँवा बैठी और बिहार में उसके राजनीतिक सहयोगी रामविलास पासवान अपने 29 विधायकों की ताक़त के बावजूद पटना में 'सत्ता की चाबी' का इस्तेमाल नहीं कर सके.

उनके विधायक बिखर गए. भारतीय जनता पार्टी और जनता यू का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दल बदल रहे इन लोजपा विधायकों के सहयोग से सरकार बनाने की कवायद शुरू करता, इससे पहले ही विधानसभा भंग कर दी गई.

सर्वोच्च न्यायालय इस फ़ैसले को असंवैधानिक बता चुका है. लेकिन चुनाव चालू है.

मत विभाजन

बिहार एक बार फिर उधेड़बुन में हैं. वह किसे चुने और और किसे ख़ारिज करे. कई राजनीतिक प्रेक्षक फिर एक खंडित जनादेश का अंदाज़ लगा रहे हैं.

ऐसे लोगों का तर्क है कि सूबे में राजनीतिक समीकरण लगभग जस के तस हैं.

नीतीश कुमार
नीतीश कुमार को भावी मुख्यमंत्री के रुप में पेश किया गया है

आम मतदाताओं में पहले की तरह ही उदासीनता है. फरवरी 2005 के चुनाव में मतदान कम हुआ था. महज 40.5 फीसदी मतदाता ही वोट डालने गए. बीते 40 साल में इतना कम मतदान पहले कभी नहीं हुआ था.

मतदाताओं की उदासीनता का कारण समझना कठिन नहीं है. आम मतदाताओं ने बिहार में 15 सालों से 'राज' कर रहे 'लालू-राबड़ी कुनबे' से एक तरफ अपनी गहरी नाराज़गी जताई तो सत्ता पर दावेदारी ठोंक रहे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेतृत्व को लालू-राबड़ी का ठोस विकल्प मानने से भी उसने इंकार कर दिया.

लालू के राष्ट्रीय जनता दल को कुल 25.07 प्रतिशत वोट मिले और 75 सीटें जीतकर वह नंबर वन रहा. भारतीय जनता पार्टी को कुल 10.97 प्रतिशत वोट मिले. वह 37 सीटें ही हासिल कर सकी.

उसके सहयोगी दल जनता दल यू को मिलीं 55 सीटें. उसका वोट प्रतिशत रहा 14.55.

रामविलास पासवान की एलजेपी, जिसने सत्ता की चाबी पाने का दावा किया था, उसे कुल 29 सीटें मिलीं. उसका वोट प्रतिशत रहा 12.62.

जातियों की राजनीति

पासवान चाहते तो बिहार में किसी न किसी गठबंधन की सरकार बन जाती पर उन्होंने सबका 'खेल' बिगाड़ते हुए स्वयं अपना 'राजनीतिक गणित' भी ख़राब कर लिया.

फरवरी के चुनाव के बाद बिहार में पहली बार वह एक ताक़त बनकर उभरे थे लेकिन इस्तेमाल से पहले ही उनकी ताक़त चुक गई. हालाँकि उनका वह ताक़त भी 'उधार' की थी.

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी
लालू प्रसाद यादव ने इस बार टिकट बाँटने में सावधानी बरती है

उन्होंने उसे अपने दलित-पिछड़े समीकरण के बल पर नहीं, कुछ कुख्यात बाहुबलियों और लालू-काँग्रेस से नाराज़ कुछ 'सवर्ण-दिग्गजों' के बल पर हासिल की थी.

इसमें उन्हें कही से कोई सकारात्मक समर्थन मिला था तो वह था बिहार के कुछ हिस्सों की अत्यंत पिछड़ी जातियों का.

लालू-राबड़ी परिवार के 15 साल के शासन के दौरान कुछ ठोस हासिल न हो पाने के क्षोभ से यह जातियाँ सामाजिक न्याय के इन 'मसीहाओं' से नाराज़ रही हैं. बिहार में इन जातियों के मतदाता 30 से 35 फीसदी आँके जाते हैं. 1990 और उसके बाद के कई चुनावों में इन जातियों का बड़ा हिस्सा लालू यादव के साथ रहा. लेकिन फरवरी 2005 में लालू को इस समुदाय का आक्रोश झेलना पड़ा.

इन समुदायों को राजद को अपेक्षाकृत कम समर्थन मिला. परिणामस्वरूप वह 75 सीटों से आगे नहीं बढ़ सका. अत्यंत पिछड़ी जातियों के वोट बुरी तरह बंटे. राजद के अलावा जनता दल यू, भाजपा, एलजेपी और भाकपा-माले को भी राज्य के कुछेक हिस्सों में इनका समर्थन मिला.

एमवाई में दरार

पिछले चुनाव की एक ख़ास बात और थी. लालू यादव का यादव-मुस्मिल (एम-वाई) समीकरण भी थोड़ा दरका था. इसके पीछे मोटे तौर पर दो कारण थे.

एक तो राजद शासन की कमज़ोरियाँ और दूसरा बड़ा कारण था चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में हुई धांधली.

लालू और उनके परिवार के कुछेक सदस्यों ने मान लिया था कि वह जिसे अपना उम्मीदवार बनाएंगे,सारे यादव-मुस्लिम उसे आँख मूंदकर वोट देंगे.

 पिछले 10 सालों से भाजपा के साथ खड़े नीतीश इस यथार्थ से कैसे मुंह मोड़ सकते हैं. उनके सत्ता में जाने का रास्ता तो हर हालत में इधर से ही गुज़रता है

एम-वाई समीकरण के मतदाताओं ने राजद नेतृत्व के इस भ्रम को तोड़ दिया.

इस बार एक फर्क आया है. 15 सालों के जद-राजद शासन से लोगों की निराशा पहले ही तरह बरकरार है लेकिन लालू और उनकी टीम ने इस बार टिकट-बंटवारे में पहले जैसी मनमानी नहीं की है.

इसके दम पर वे कितने सफल होंगे यह तो वक़्त बताएगा. अगर वो इसमें सफल हुए और अपने साथ अत्यंत पिछड़ी जातियों का लगभग 30 फीसदी वोट भी जोड़ सके तो बिहार की सत्ता में उनकी वापसी कोई रोक नहीं सकता.

अगर ऐसा नहीं हुआ तो नवंबर 2005 पाटलिपुत्र लालू यादव के राजनीतिक पतन का गवाह बनेगा.

उनके प्रबल प्रतिद्वंदी और राजग की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार नीतीश कुमार इस समीकरण के असर से अच्छी तरह वाकिफ हैं. वह बिहार की अत्यंत पिछड़ी जातियों के वोट में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं.

निजी तौर पर उनकी छवि भी ठीकठाक है. लेकिन उनके गठबंधन की छवि इन समुदायों में कत्तई अच्छी नहीं कही जाएगी. पिछले 15 सालों से बिहार का 'सवर्ण-सामंती मिजाज़' मध्यवर्ती जातियों और अन्य पिछड़ों के सीमित राजनीतिक-आर्थिक उदय से आक्राँत रहा है.

यह मिजाज़ पूरी तरह राजग के साथ हैं. वह नीतीश की जीत में अपने पुनरुथान का सपना देख रहा है. 'लोकदलीय' नीतीश की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना यही है.

लेकिन पिछले 10 सालों से भाजपा के साथ खड़े नीतीश इस यथार्थ से कैसे मुंह मोड़ सकते हैं. उनके सत्ता में जाने का रास्ता तो हर हालत में इधर से ही गुज़रता है.

पासवान की भूमिका

जहाँ तक पासवान का सवाल है, इस बार उनकी भूमिका सिर्फ़ लालू को कमज़ोर करने भर की है.

इतना तय है कि बिहार की अगली विधानसभा में उनकी लोजपा की कोई ख़ास ताक़त नहीं होगी.

पासवान
पासवान की राजनीति पर इस बार नज़रें हैं

लेकिन वह हर जगह राजद-काँग्रेस-रांकपा गठबंधन के उम्मीदवारों के वोटबैंक में सेंध लगाएंगे.

पिछले चुनाव में उन्होंने कई स्थानों पर राजग के वोट काटे थे और कुछेक स्थानों पर उसेक स्वाभाविक प्रत्याशियों को अपने दल की तरफ खींचा था. लेकिन इस बार समीकरण बदले हुए हैं.

सवर्ण समुदाय का छोटा हिस्सा भी इस बार उनका साथ नहीं देना चाहेगा. उन्हें ले-देकर अपने पारंपरिक पासवान और अत्यंत पिछड़े मतदाताओं पर ही निर्भर रहना होगा.

अत्यंत पिछड़ी जातियों में वोट लेकर वह लालू को कमज़ोर ज़रूर करेंगे लेकिन बिहार में वह स्वयं दलितों के एकमात्र विकल्प नहीं हैं.

भाकपा-माले, बसपा और अन्य स्थानीय संगठनों ने भी दलित समुदायों में अपनी पैठ बनाई है.

पिछले चुनाव में किसी तरह के गठबंधन और धनबल के बगैर माले को सात सीटों पर सफलता मिली थी. पहली बार उसके चार विधायक जीते. लालू से गहरे तौर पर नाराज़ यादवों के एक हिस्से ने सपा का साथ दिया था.

बसपा को 4.41 प्रतिशत वोट मिले थे. लेकिन कोई ज़रूरी नहीं कि बिहार में इस बार फिर वैसा ही हो.

इतिहास की पुनरावृत्ति हर बार एक जैसी नहीं होती. अगर हू-ब-हू वैसी हुई तो यह वाकई एक राजनीतिक प्रहसन ही होगा.

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