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बिहार में तीसरे चरण के बाद भी अनिश्चितता

नीतीश कुमार
पहले दो चरणों के बाद अनुमान लगाए जा रहे थे कि एनडीए को फ़ायदा हो सकता है
तीसरे दौर के मतदान से जिन लोगों को बिहार में राजनीतिक स्थिरता की संभावना बनती दिख रही थी वे भी अब मोहभंग की स्थिति में हैं और चिंताग्रस्त हैं.

मतदान के दो शुरूआती दौरों में नीतीश के नेतृत्व वाले जेडी यू- बीजेपी धड़े को थोड़ी बढ़त मिलते देख ऐसी धारणा बनी थी कि संभवतः तीसरे दौर के मतदान में भी यह धड़ा अपनी स्थिति थोड़ी और पुख़्ता कर ले मगर ऐसा हो नहीं पाया है.

मतदान के बाद चुनाव बूथों से बाहर निकलते मतदाताओं की रायशुमारी (एक्जिट पोल) ने ऐसी तमाम संभावनाओं को ख़ारिज करते हुए 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 122 के जादुई आँकड़े को तेज़ी से छूने की किसी भी धड़े की कोशिश को अब तक नाकाम बताया है.

19 नवंबर को होने वाले चौथे दौर के मतदान के फ़ैसलाकुन होने की आशा अब भी बनी हुई है मगर ज़्यादातर चुनाव पंडितों का मानना है कि कुल मिलाकर तस्वीर पहले जैसी धूमिल ही बनती दिखती है और वे चौथे दौर से भी किसी चमत्कार की आशा नहीं रखते.

यह राजनीतिक धूमिलता बिहार का दुर्भाग्य होगी मगर अब कुनबों, जातियों और धार्मिक आधारों पर पूरी तरह बँटे मतदाताओं से आप कितनी और किस तरह की आशा रख सकते है?

तीसरे दौर का मतदान यादव और मुस्लिम बहुल चुनाव क्षेत्रों में हुआ.

लालूप्रसाद यादव
लालू का यादव-मुस्लिम गणित पिछले चुनावों में गड़बड़ा गया था

इस वर्ष के शुरू में हुए चुनाव में इसी इलाके का मतदान काफी बँटकर हुआ था. यादव मतों ने केवल लालू की तरफ रुख नहीं किया था और मुस्लिम मत भी अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में अलग-अलग उम्मीदवारों को मिले थे जिसका लाभ रामविलास की एलजेपी को सबसे ज़्यादा मिला था.

मगर इस बार एलजेपी में उसके पिछले समर्थकों की भी आस्था डगमगाई हुई है.

‘एक्ज़िट पोल’ की रपटों में भी कहा गया है कि रामविलास पासवान के रुख को पहले राज्य में राष्ट्रपति शासन और बाद में एक वर्ष के भीतर दूसरा चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार मानने वालों की दादाद में जबर्दस्त इज़ाफ़ा हुआ है.

बावजूद इसके कि पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का मुद्दा उठाकर मुसलमान मतदाताओं को रिझाने की कोशिश में लगे रहे हैं, उनकी काठ की हाँडी का दोबारा चढ़ना मुश्किल ही लगता है.

सीटों के आँकड़े

मतदाताओं की रायशुमारियों के मुताबिक पिछले बार की 32 सीटों में से इस बार उन्हें 16 से 19 सीटें ही मिलने की उम्मीद जताई गई है. एक चैनल की रायशुमारी तो उन्हें सिर्फ़ 12 सीटों पर ही विजयी मानती है.

लालू नेतृत्व वाले राजद-काँग्रेस धड़े को पिछले चुनाव में भी तीसरे दौर के इन चुनाव क्षेत्रों में 21 सीटें प्राप्त हुई थी.

इस बार उन्हें दो चैनलों की रायशुमारियों में क्रमशः 22 और 26 सीटें मिलने की बात कही गई है. नीतीश के नेतृत्व वाले जेडी यू- भाजपा धड़े को इन तीसरे दौर वाले चुनाव क्षेत्रों में 26 सीटें मिली थीं जिन्हें ताजा ‘एक्जिट पोल’ कराने वाली दो एजेंसियों ने इस बार क्रमशः 27 और 25 सीटें दी हैं.

चौथे दौर के चुनाव राजधानी पटना सहित अधिकतर शहरी इलाकों में होंगे.

पासवान
संकेत हैं कि पासवान को भी इस बार झटका लग सकता है

जिसे लालू का अपहरण-लूट-बलात्कार-हत्या वाला कथित ‘जंगल राज’ कहा जाता है, उसका सबसे अधिक दंश इन शहरी इलाकों को ही झेलना पड़ा है.

ज़ाहिर है कि इन शहरी क्षेत्रों में लालू के समर्थन के लिए कोई उत्साह नज़र नहीं आता.

हालाँकि जातीय समीकरणों का गणित इन इलाकों में यादव, कुर्मी अन्य पिछड़ी जातियों और मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या के आधार पर यहाँ नीतीश के धड़े को मामूली बढ़त मिलने की बात कहता है.

मगर फ़िलहाल लालू और नीतीश दोनों धड़ों की अपेक्षाएँ तीसरे दौर की अनिश्चितता के बाद चौथे दौर में मिल सकने वाली अंतिम और निर्णायक बढ़त पर ही टिकी हुई है.

(लेखक 'दिनमान' और 'स्वतंत्र भारत' के पूर्व मुख्य संपादक हैं)

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