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गुरुवार, 10 नवंबर, 2005 को 13:06 GMT तक के समाचार
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यादव समाज में नई सुगबुगाहट

बिहार
बिहार से बाहर के लोग इस कहावत से परिचित नहीं हैं कि ‘रोम पोप का, सहरसा गोप का.’

दरअसल सहरसा, मधेपुरा, सुपौल आदि क्षेत्र में यादव समाज न केवल बड़ी संख्या में हैं बल्कि यहाँ पर वह हर क्षेत्र में दबदबा भी रखता है. इसीलिए यह कहावत बनी है.

दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, पूर्वी व पश्चिमी चंपारण जैसे ज़िलों में मुसलमान समाज की बड़ी संख्या है.

पिछले 15 वर्षों से मुसलमान समाज के लोग यादव समाज के साथ मिलकर वोट करते आ रहे थे.

यह सिलसिला पिछली बार टूटा और चुनाव में जनता दल-यू को इस क्षेत्र में ख़ासी सफलता मिली. इस बार यह किसके लिए वाटर लू साबित होगा कह नहीं सकते.

आनेवाली 13 तारीख़ को यहाँ चुनाव होने वाले हैं और इस चुनाव में जीत के लिए लालू यादव के साथ नीतीश कुमार और रामविलास पासवान ने जी जान लगा दी है. नीतीश कुमार से ज़्यादा इस क्षेत्र में शरद यादव की प्रतिष्ठा दाँव पर है.

प्रधानमंत्री आठ नवंबर को इस क्षेत्र में आए थे और उन्होंने लालू यादव की जमकर तारीफ़ की.

उन्होंने लालू यादव को चमत्कारी मंत्री तक कह डाला और यह भी इशारा किया कि बिहार में विकास तभी होगा जब लालू यादव की सरकार बनेगी.

ध्यान देने की बात है कि प्रधानमंत्री केवल लालू यादव की बात करते रहे, हालाँकि उनकी एक सभा में राबड़ी देवी भी मौज़ूद थीं. क्या इससे भविष्य का कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता है ?

पर अंदाज़ को छोड़ भी दें तो प्रधानमंत्री ने इस पूरे क्षेत्र के यादव समाज में एक नई सुगबुगाहट पैदा कर दी है, वह यह कि सारा यादव समाज सोचने लगा है कि जब प्रधानमंत्री लालू यादव की तारीफ़ इतनी ज़्यादा कर रहे हैं तो ज़रूर कोई बात होगी.

उन्हें यह भी एहसास हुआ है कि प्रधानमंत्री की तारीफ़ के पीछे यह सत्यता है कि लालू यादव की बिना दिलचस्पी के सरकार नहीं चल सकती. प्रधानमंत्री की यात्रा लालू यादव के लिए काफी फ़ायदेमंद साबित हो रही है.

नया समीकरण

तीन परंपरागत दुश्मन पिछली बार आमने-सामने थे जिसकी वजह से इस क्षेत्र में सबसे ज़्यादा फ़ायदा जनता दल-यू को हुआ था.इस बार ऐसा नहीं है.

तीनों अपने-अपने कारणों से इस बार एक साथ हैं. पप्पू यादव जेल में हैं. लेकिन उनकी सांसद पत्नी उनका संदेश यादवों के बीच ले जा रही हैं.

तस्लीमुद्दीन को लालू यादव ने समझा लिया है और आनंदमोहन को दिग्विजय सिंह ने साध लिया है.

बिहार में मतदाता
बिहार में पिछड़ी जाति के लोगों की अहम भूमिका होगी

लवली आनंद से उनकी अकेले में बात हुई और उसके बाद ही लवली आनंद ने बाढ़ से चुनाव लड़ने का इरादा बदल दिया.

बिहार के बाहर के लोगों को बता दें कि लवली आनंद, आनंद मोहन की पत्नी हैं और लोकसभा की सदस्य रह चुकी हैं.

नीतीश कुमार के साथ आनंद मोहन चले गए थे और अभी तक नीतीश कुमार ने आनंद मोहन को जनता दल-यू से निकाला नहीं है. कांग्रेस के अधिकांश जीत सकने वाले प्रत्याशी इन्हीं क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे हैं.

पिछड़ी जातियों की भूमिका

तीसरा सबसे बड़ा फैक्टर अति पिछड़ी जातियों का है जो इस क्षेत्र में बहुत ही ज़्यादा हैं. इन जातियों के पास ही संतुलन बदलने की क्षमता है.

दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, चंपारण के दोनों हिस्से,मधेपुरा, सहरसा तथा सुपौल में यह जातियाँ बिखरी हैं पर हैं बड़ी संख्या में लगभग सौ के आसपास.

इन जातियों में केवट, निषाद, मल्लाह, धानुक, नोनिया, नाई, गंगोता, कानू, नागर, तांती,चंद्रवंशी, बिंद, पाल, कुम्हार प्रमुख हैं.

उन्हें कभी प्रमुखता ही नहीं मिली. जनता दल- यू ने जयनारायण निषाद को नाराज़ किया.वे निषादों के नेता हैं.

राज्यसभा से त्यागपत्र देकर वे लालू यादव का प्रचार कर रहे हैं.चंद्रवंशी समाज उमाभारती के बयानों से नाराज़ है और वह उग्र प्रदर्शन भी कर चुका है.

इस बार के चुनाव में इन अति पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधियों को सबसे ज़्यादा पासवान ने टिकट दिए हैं.

इन उम्मीदवारों के जीतने की आशा इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इन्हें पासवान का दलित वोट पूरा मिल सकता है और उस स्थिति में मुसलमान भी उनके साथ जा सकता है.

आपको एक दिलचस्प जानकारी दें. लोक जनशाक्ति पार्टी ने अपने कुल 204 उम्मीदवारों में 24 अति पिछड़ों को टिकट दिए हैं.

जबकि माले ने 85 उम्मीदवारों में 18 अति पिछड़े खड़े किए हैं.इसी तरह जनता दल-यू ने 139 उम्मीदवारों मे से 14 अति पिछड़े और आरजेडी ने 176 उम्मीदवारों में केवल 8 अति पिछड़े खड़े किए हैं.

भाजपा ने 101 उम्मीदवारों में केवल 7, सीपीआई ने 35 में से केवल 2, सीपीआईएम ने 10 में 2 और काँग्रेस ने किसी अति पिछड़े उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया.

यह तस्वीर अति पिछड़ों के रुख़ का संकेत दे देती है. मुसलमान इस स्थिति में उसे ही वोट देगा जो एनडीए को हराता दिखाई देगा.

आशा करनी चाहिए कि पिछले चुनाव से ज़्यादा इस बार अति पिछड़े चुनाव जीत सकते हैं.इसलिए पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि कौन ज़्यादा फायदे में रहेगा, पर साख तो लालू यादव के साथ शरद यादव की भी दॉव पर लग गई है.

जो भी यहाँ फायदा होना है पासवान का ही होना है. दो बिल्लियों की लड़ाई में किसी को तो बाज़ी मारनी ही है.

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