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'चार हफ़्ते में सब कुछ नहीं सुधर सकता' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"मुझे लगा कि क़यामत आ गई है. फिर मैंने याद किया कि आज तो शनिवार है, आज भला क़यामत कैसे आ सकती है.मैंने अपना घर बुरी तरह हिलते देखा- एक झूले की तरह और फिर सबकुछ ख़त्म हो गया." ये शब्द हैं भूकंप प्रभावित उड़ी में रहने वाले रियाज़ के जो भूकंप आने के वक्त अपने मकान की तीसरी मंज़िल में शीशे लगवा रहे . 16 कमरों के मकान में रहने वाले रियाज़ अब उड़ी के लगामा गाँव में एक राहत शिविर में रह रहे हैं. अपने बूढ़े माँ-बाप को इन्होंने श्रीनगर भेज दिया है लेकिन ख़ुद यहीं, समुद्र तल से क़रीब 11 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर रह रहे हैं. उड़ी में ऐसे कई परिवार हैं इनकी तरह. यहाँ ज़्यादातर गाँव तबाह हो गए हैं. इन दिनों राज्य के बाहर से कुछ लोग मदद के लिए और कुछ सर्वेक्षण के उद्देश्य से यहाँ आकर इनके साथ रह रहे हैं. इन्हीं में से एक, निरंजन पारेख, मुंबई से यहाँ आए हैं. निरंजन पेशे से इंजीनियर हैं. वो बताते हैं, "यहाँ के मकान वैसे बने ही इस प्रकार है मानो किसी को यकीन ही न हो कि यहां कभी भूकंप आ सकता है. मकानों को बनाने का तरीका और उसमें इस्तेमाल किया गया सामान, दोनों के चयन में लोगों ने इस क्षेत्र के भूकंप के लिए संवेदनशील होने का ध्यान नहीं रखा था." निरंजन चिंता ज़ाहिर करते हुए बताते हैं, "इसके चलते इस क्षेत्र के मकानों की अगर ऊपरी तौर पर मरम्मत कर भी दें तो कोई फ़ायदा नहीं होगा क्योंकि मकानों की बुनियाद ही ग़लत ढंग से रखी गई थी. अब अगर इसे सुधारना हैं तो नए सिरे से मकान बनाने होंगे." चार सप्ताह बाद यहाँ राहत सामग्री पहुँच रही है और अब कम से कम कामचलाऊ चूल्हा, अंगीठी और बिस्तर यहाँ पर हैं. यहीं हमें मिले इर्शाद, जिन्होंने हमें बताया, "यह ईद बड़ी विचित्र गुज़री. हम कभी सोच भी नहीं सकते थे कि खुले आसमान के नीचे हमें रातें बितानी पड़ेंगी." अब भूकंप को चार सप्ताह बीत चुके हैं और अब चर्चा है नियंत्रण रेखा खोलने की, जहाँ पाकिस्तान से लगे इन ज़िलों में नियंत्रण रेखा खोलने के लेकर कुछ उत्सुकता और दिलचस्पी ज़रूर है.
लेकिन जब ख़ुद का जीवन पटरी से उतर गया हो तो केवल रिश्तेदारों से मिलना यहाँ प्राथमिकता नहीं है. और फिर नियंत्रण रेखा पार करने से पहले की औपचारिकताएं, उसमें कम से कम इस इलाके के लोग उलझने के लिए बहुत इच्छुक नज़र नहीं आते. तीतवाल क्षेत्र से लौटे कुछ लोग हमें मिले ज़िन्होंने बताया कि सीमापार पाकिस्तानी भाइयों की तबाही को झरने के पार से वे देख सकते हैं और वहाँ बेबसी बहुत है. लिहाज़ा उनकी सहायता यदि किसी तरह हो सके तो वे उसे ज़रूर करना चाहेंगे. कुल मिलाकर इस गांव औऱ आसपास के लोगों से बातचीत करने के बाद यही लगा कि सेना और उसके काम से यहाँ के लोग मोटे तौर पर संतुष्ट हैं किंतु राज्य प्रशासन के प्रति नाराज़गी है. बहरहाल, जैसा कि यहाँ एक बुज़ुर्ग ने हमसे कहा, "पूरी ज़िंदगी मेहनत करके कमाई पूँजी से ज़िंदगी की इमारत तैयार की जाती है. सबकुछ खो देने के बाद चार सप्ताह में तो सबकुछ दोबारा तैयार नहीं हो सकता है." | इससे जुड़ी ख़बरें भूकंप प्रभावित इलाक़ों में ईद मनाई गई04 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस कश्मीर में फ़ोन सेंटरों पर लंबी क़तारें19 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस भारत ढाई करोड़ डॉलर की सहायता देगा27 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस राहत शिविरों की कमी पर चिंता15 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस लोगों को अभी भी सहायता का इंतज़ार09 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस मनमोहन सिंह ने की अपील13 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस ख़राब होते मौसम से सरकार चिंतित12 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस भूकंप राष्ट्रीय आपदा: मनमोहन सिंह11 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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