| राहत शिविरों की कमी पर चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार से कहा है कि वह जम्मू कश्मीर के भूकंप प्रभावित इलाक़ों के लिए तत्काल ज़्यादा राहत शिविरों का इंतज़ाम करे. उल्लेखनीय है कि भारतीय कश्मीर में हज़ारों कश्मीरी खुले आसमान के नीचे रातें काट रहे हैं. राज्य के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद का भी मानना है कि तंबुओं की भारी कमी है. उनका कहना है कि लोगों को सिर छिपाने के लिए तंबू उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है. जम्मू-कश्मीर के उड़ी और तंगधार सबसे अधिक प्रभावित ज़िले हैं जहाँ 140 गाँवों में भूकंप ने तबाही मचाई है. लेकिन कुछ गाँव अब भी ऐसे हैं जहाँ राहत नहीं पहुँच सकी है क्योंकि वहाँ पहुँचने के रास्ते चट्टानों के गिरने के कारण बंद हो गए हैं. तंबुओं की कमी मानवाधिकार आयोग के दल ने प्रभावित इलाक़ों का तीन दिवसीय दौरा किया था. मानवाधिकार आयोग ने सलाह दी है कि सरकार अनाथ बच्चों, विधवाओं और प्रभावित बच्चियों की एक कंप्यूटरीकृत सूची बनाए ताकि सहायता कार्य प्रभावी ढंग से चल सके. आयोग के इस दल में महानिदेशक-जाँच जीएस राजगोपाल, अजित भरहोक और एके पाराशर शामिल थे. मानवाधिकार आयोग की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकार को प्रभावित इलाक़ों के लिए तत्काल राहत उपलब्ध करानी चाहिए. इस दल का कहना है कि सर्दी का मौसम शुरू हो गया है और ठंड के कारण बच्चों और कमज़ोर लोगों के लिए ख़तरा है. मानवाधिकार आयोग का कहना है कि ज़रूरत से कम संख्या में तंबू उपलब्ध हैं और अस्थाई कैंप बनाए जाने चाहिए. समाचार एजेसी पीटीआई के अनुसार जम्मू कश्मीर में शनिवार को भूकंप के दो हल्के झटके भी महसूस किए गए जिससे लोगों में दहशत फैल गई. मौसम विभाग के अनुसार तड़के सुबह लगभग एक बजे भूकंप का झटका महसूस किया गया. यह रिक्टर स्केल पर 5.4 मापा गया. दूसरा झटका 9.55 सुबह आया. हालाँकि इनसे किसी नुक़सान की कोई ख़बर नहीं है. |
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