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उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं: विश्लेषक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय विश्लेषक मानते हैं कि नेपाल नरेश के इमरजेंसी हटाने से बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए. इस बात पर नज़र रखनी होगी कि प्रेस और राजनीतिक स्वतंत्रता का क्या होता है. नेपाल नरेश ने एक फ़रवरी, 2005 को शेर बहादुर देउबा सरकार को बरख़ास्त करके सत्ता अपने हाथ में ले ली थी और देश में इमरजेंसी लगा दी थी. इमरजेंसी की मियाद ख़त्म होने से पहले नेपाल नरेश ने इसे हटा लिया. नेपाल मामलों के जानकार प्रोफेसर परमानंद का कहना है कि इमरजेंसी की मियाद पूरी हो रही थी ऐसे में राजा ज्ञानेंद्र के आगे और कोई रास्ता नहीं था. नेपाल नरेश पर अंतरराष्ट्रीय और भारत का लगातार बना हुआ था इसलिए यह केवल तकनीकी क़दम भी हो सकता है. लेकिन वो आगाह करते हैं कि इससे बहुत उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है. प्रोफेसर परमानंद का कहना है कि कुछ ही दिन पहले उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री देउबा और अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया था. उनका कहना है कि इस घोषणा का असली परीक्षण इस बात से होगा कि प्रेस स्वतंत्रतता का क्या होता है और गिरफ़्तार लोगों को रिहा किया जाता है या नहीं. उनका मानना है कि राजा का सत्ता से जुड़ाव बहुत है. इसको देखते हुए इस घोषणा पर सतर्क रहने की ज़रूरत है. वो कहते हैं, '' अभी तक के क़दमों से राजा की संविधान और बहुदलीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता नज़र नहीं आती है.'' ''राजा ने आम चुनाव टाल दिए और उसकी जगह नगरपालिका के चुनाव कराने की घोषणा कर दी. जबकि ये चुनाव शहरी इलाक़ों तक ही सीमित हैं.'' इधर भारत भी दबाव में था. भारत ने हथियार की आपूर्ति बंद करने की घोषणा तो कर दी थी. लेकिन उसके बाद चीन और पाकिस्तान के नेपाल के आपूर्ति की ख़बरों के बाद जकार्ता में भारत ने हथियारों की आपूर्ति बहाली की आश्वासन दे दिया था. प्रोफेसर परमानंद का कहना है कि राजा ने राजनेताओं को भी बांटने की कोशिश की. उन्होंने गिरजाप्रसाद कोईराला को तो छोड़ दिया लेकिन वामपंथी नेता माधव नेपाल को नहीं रिहा किया. फिर पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को गिरफ़्तार कर लिया. इसलिए राजा के इमरजेंसी सामप्ति की घोषणा के बाद के क़दमों पर नज़र रखने की ज़रूरत है. |
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