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इमरजेंसी हटाए जाने का स्वागत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में महाराज ज्ञानेंद्र के इमरजेंसी हटाने जाने की घोषणा का विपक्ष ने स्वागत किया है. भारतीय विदेश मंत्री नटवर सिंह ने बीबीसी के साथ बातचीत में इस घोषणा का स्वागत किया है. दूसरी ओर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत की दिशा में यह पहला क़दम है. प्रवक्ता का कहना था कि भारत सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई और नागरिक स्वतंत्रता चाहता है. उसका कहना था कि भारत का मानता है कि बहुदलीय लोकतंत्र और राजशाही दोनों साथ साथ काम करे और चुनौतियों का सामना करें. इसके पहले भारत ने नेपाल में इमरजेंसी लगाए जाने की कड़ी आलोचना की थी. नेपाल में शेर बहादुर देउबा सरकार को बरख़ास्त करके महाराज ज्ञानेंद्र ने सत्ता अपने हाथ में लेने के साथ ही 1 फ़रवरी 2005 को देश में इमरजेंसी लगा दी थी. नेपाल में तीन महीने के लिए इमरजेंसी लगाने की घोषणा की गई थी और सोमवार को इमरजेंसी की मियाद ख़त्म होने वाली थी. इस बात पर सबकी निगाहें टिकीं थी कि राजा इमरजेंसी की मियाद बढ़ाएँगे या फिर उसे समाप्त कर देंगे. इंडोनेशिया, चीन और सिंगापुर के दौरे से लौटकर राजा ज्ञानेंद्र ने इसकी घोषणा की. शाही आदेश में कहा गया कि यह फ़ैसला नेपाल के संविधान के अनुसार किया गया है. दबाव महाराज ज्ञानेंद्र ने इंडोनेशिया में एशिया-अफ्रीका शिखर सम्मेलन में दुनिया के कई प्रमुख नेताओं से मुलाक़ात की थी जिनमें भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल थे.
नेपाल नरेश ने इस मंच से बोलते हुए आश्वासन दिया था कि वे देश में लोकतंत्र की बहाली करेंगे. नेपाल नरेश ने शेर बहादुर देउबा की सरकार को यह कहते हुए बरख़ास्त कर दिया था कि वह माओवादी हिंसा से निबटने में नाकाम रही है. इसके बाद नेपाल नरेश ने सत्ता अपने हाथ में ली ली थी. कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था और मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी. नेपाल नरेश के इस क़दम की दुनिया भर में कड़ी आलोचना हुई थी और लोकतंत्र बहाली की माँग उठी थी. इमरजेंसी के हटने के बाद नेपाल की स्थिति में कितना बदलाव आएगा यह कहना मुश्किल है क्योंकि यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इमरजेंसी हटने के बाद देश की जनता के किन अधिकारों की बहाली होगी. |
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