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नेपाल को सैनिक सहायता बहाल होगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत पड़ोसी देश नेपाल को सैनिक सहायता दोबारा शुरू करने पर सिद्धांत रूप से सहमत हो गया है. नेपाल में राजा के सत्ता में आने के बाद भारत ने उसे सैनिक सहायता बंद कर देने की घोषणा की थी लेकिन इंडोनेशिया में राजा ज्ञानेंद्र और भारत के प्रधानमंत्री की मुलाक़ात के बाद निर्णय में परिवर्तन के समाचार मिल रहे हैं. बताया जा रहा है कि नेपाल नरेश ने भारतीय प्रधानमंत्री को आश्वासन दिया है कि वे देश में जल्द से जल्द लोकतंत्र बहाली करेंगे. नेपाल को सैनिक सहायता दोबारा शुरू करने के भारत के इस फ़ैसले पर कूटनयिक हलक़ों में किसी को ख़ास हैरत नहीं हुई है. दरअसल, पिछले कुछ सप्ताह से भारत नेपाल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए मौक़े की तलाश में रहा है, नेपाल के राजा ने भारत के निर्णय पर अपने ग़ुस्से का इज़हार किया था और काठमांडू में भारतीय राजदूत के ज़रिए उन्होंने इसे भारत तक पहुँचाया भी था. कूटनीतिक स्तर पर भारत को अपने फ़ैसले की दोबारा समीक्षा करनी पड़ी क्योंकि चीन और पाकिस्तान ने नेपाल के साथ अपने संबंध पहले जैसे ही रखे. ज़ाहिर है, पिछले कुछ समय में भारत के संबंध चीन और पाकिस्तान से बहुत सुधरे हैं लेकिन वह नहीं चाहता कि नेपाल में इन दोनों पड़ोसी देशों का प्रभाव बढ़े और भारत से नेपाल के संबंध हाशिए पर चले जाएँ. भारत नेपाल में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है और नेपाल के कुल विदेशी व्यापार का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत के साथ होता है. इसके अलावा, भारत को माओवादी विद्रोहियों की ताक़त बढ़ने की भी चिंता है, भारत को लगता है कि सैनिक सहायता नहीं मिलने पर नेपाल माओवादियों को नियंत्रित नहीं कर पाएगा. नेपाल के माओवादियों के तार भारत के नक्सली विद्रोहियों से जुड़े हुए हैं इसलिए भारत की चिंता है कि उनकी ताक़त बहुत न बढ़ जाए. शायद यही वजहें हैं कि भारत ने अपने पुराने निर्णय में संशोधन का फ़ैसला किया है, लेकिन अभी तक न तो इसकी आधिकारिक घोषणा की गई है और न ही नेपाल की ओर से प्रतिक्रिया मिली है. |
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