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नेपाल में राजनीतिक कैदियों की रिहाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में एक पूर्व उपप्रधानमंत्री समेत 60 लोगों को जेलों से रिहा कर दिया गया है. फ़रवरी महीने में नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र के सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद इन सभी को हिरासत में ले लिया गया था. एक दिन पहले ही एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था कि नेपाल में 3000 राजनीतिक क़ैदी जेलों में बंद है. पूर्व उप प्रधानमंत्री भरत मोहन अधिकारी को 81 दिनों तक घर में नज़रबंद रखा गया. अधिकारी मार्क्सवादी लेनिनवादी संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हैं. शेर बहादुर देउबा की गठबंधन सरकार के चार दलों में यह दल भी था. नेपाल नरेश ने फरवरी में देउबा सरकार को बर्खास्त कर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी. नरेश ज्ञानेंद्र इस समय जकार्ता में एफ्रो एशियाई देशों के सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नरेश ज्ञानेंद्र के सत्ता अपने हाथ में लेने के कदम की कड़ी आलोचना हुई है. अमरीका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और भारत ने नरेश को देश में लोकतांत्रिक सरकार का गठन करने के लिए भी कहा है. मानवाधिकार उल्लंघन लंदन स्थित एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि नेपाल में फरवरी महीने के बाद से भारी पैमाने पर राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों, छात्रों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई है. संगठन ने स्थानीय मानवाधिकार गुटों के हवाले से कहा है कि नेपाल में 3000 से अधिक लोग हिरासत में हैं और कई कैदियों के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है. एमनेस्टी का कहना है " मानवाधिकार उल्लंघन को रोकने के लिए नेपाल के क़ानून वैसे ही कमज़ोर हैं और फरवरी के बाद से पूरी व्यवस्था ही चरमरा चुकी है." नेपाल सरकार ने एमनेस्टी की रिपोर्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. |
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