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डूबती अर्थव्यस्था की चिंता हर ओर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब न्यूयॉर्क से ख़बर आ रही थी कि शेयर बाज़ार तेज़ हवाओं में फंसे पतंग की तरह गोते खा रहा है, एक के बाद एक बैंक नीलाम हो रहे हैं, बीबीसी की एलेक्शन बस रूकी न्यू मेक्सिको राज्य के छोटे से शहर सैंटा फ़े में. घरों और दुकानों के डिज़ाइन अभी भी वैसे ही रखे गए हैं जैसे सैकड़ों साल पहले थे. शहर की रोज़ी रोटी चलती है पर्यटकों या सरकारी नौकरियों के दम पर. मुझे लगा यहां न्यूयॉर्क और अर्थव्यव्स्था की उलझनों पर शायद ही कोई बात करे. बस से उतरकर पहुँचा एक मकान के बाहर जिसके बारे में उसके मालिकों का दावा है कि वो अमरीका का सबसे पुराना मकान है और वो कहते हैं कि कार्बन डेटिंग से ये साबित हो चुका है कि यही सबसे पुराना मकान है. मकान में एक म्यूज़ियम और दुकान भी बना हुआ है. मैनेजर जैकी कैरगिल से पूछा कि सबसे बड़ा मु्द्दा क्या है इस चुनाव में उनके लिए. फ़ौरन जवाब मिला अर्थव्यव्स्था, और क्या. उनका कहना था कि खरीदारों और म्यूज़ियम देखनेवालों में साठ प्रतिशत की कमी आई है और एक दो महीनों में हालात नहीं बदले तो दुकान बंद करनी पड़ सकती है. संकट इस इलाक़े की पुरानी आर्ट, पेंटिंग, ऐंटिक की दुकान के मालिक क्रिस गार्सिया से मुलाक़ात हुई. उनकी दुकान पर ज़्यादातर बड़े बड़े पैसेवाले टूरिस्ट ही आते हैं. उनका कहना है कि ये वो लोग हैं जो मेरिल लिंच और बड़े बड़े बैंकों के शेयर रखते हैं.
और जब से अर्थव्यवस्था की ये हालत हुई है तब से धंधा मंदा हो चुका है. वहां से निकला तो आसपास के दुकानों पर इंडियन ज्वेलरी, इंडियन आर्ट का बोर्ड लगा हुआ देखा, पहले तो थोड़ा चौंका कि इस दूर दराज़ के शहर में भारत के गहने कौन बेच रहा है लेकिन फ़ौरन याद आया कि अमरीका के इन पुराने बाशिंदों को भी 'इंडियन' ही कहते हैं. थोड़ा और आगे बढ़ा तो दिखा एक रेस्तरॉं, बाहर लिखा हुआ था इस्ट इंडियन रेस्तरॉं...इंडिया पैलेस. अब कोई गलती नहीं हो सकती थी. ये तो हर हाल में देसी जगह होगी ये सोचता हुआ अंदर पहुंच गया और रेस्तरॉं के मालिक मिले सरदारजी नरेंद्र सिंह. नरेंद्र सिंह की कहानी भी अनोखी है. 1991 में उन्होंने इस रेस्तरॉं में प्लेटें धोने का काम पकड़ा था, 2001 में उसे खरीद लिया. लेकिन आज उनके सामने भी देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था परेशानियां खड़ी कर रही है. फूलन देवी कहते हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत ऐसी है बहुत सारे ग्राहक जिनमें ज़्यादातर अमरीकी हैं, आते हैं फिर मेन्यू में कीमत देखकर कहते हैं आज नहीं, जब पैसे होंगे तब आउँगा.
कहते हैं, “कि जब बड़े-बड़े बैंक फ़ेल हो रहे हैं तब तो सरकार ने उन्हें बचा लिया लेकिन हम जो छोटे बिजनेसमैन हैं उन्हें बचाने का तो कोई प्लान नहीं है सरकार के पास.” वो उदाहरण देते हैं हिंदी फ़िल्म दी बैंडिट क्वीन का कि जब फूलन देवी इक्के दुग्गे लोगों पर दुश्मनी उतार रही थी तो उसके प्रेमी ने समझाया कि जब तक एक दो लोगों को मारोगी सरकार पीछे पड़ी रहेगी. लेकिन जब 20-25 को मारोगी तो माफ़ी बख़्श देगी. “तो यही हाल यहां भी है कि जो छोटा बिजनेसमैन है वो भुगत रहा है लेकिन जो बड़े पैमाने पर ग़लतियां करनेवाले बैंक हैं उन्हें सरकार बचा कर निकाल रही है.” नरेंद्र सिंह का फलसफ़ा अमरीकी अर्थव्यवस्था की कहानी एक नायाब तरीके से पेश करता है. लेकिन जिस तरह से यहां की सरकार बाज़ार के बड़े खिलाड़ियों को गिरने से बचा रही है, उन्हें सहारा दे रही है लोगों के मन में सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब एक आम आदमी कर्ज़ लेकर खरीदे हुए घर की किस्त नहीं चुका पाता है और उसका घर नीलाम होता है, तब तो सरकार कहीं नज़र नहीं आती. अर्थशास्त्र को समझनेवाले बहुत से लोगों का जवाब है कि अगर इन अरबों डॉलर की लेनदेन करने वाले बैंकों को नहीं संभाला गया तो गाज़ आख़िर में आम आदमी पर ही गिरेगी. फ़िलहाल आम आदमी इस दलील पर यकीन नहीं कर पा रहा है और हो सकता है चार नवंबर को जब वो वोट डालने जाएगा तो ये बात ठप्पा लगाकर या वोटिंग मशीन का बटन दबाकर भी बताएगा. (ब्रजेश उपाध्याय बीबीसी की उस विशेष बस पर सवार हैं जो राष्ट्रपति पद के चुनावों से पहले अमरीकियों की राय भांपने के लिए विभिन्न प्रांतों से गुज़र रही है) |
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