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बुधवार, 17 सितंबर, 2008 को 10:40 GMT तक के समाचार
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अमरीका का एक चेहरा ये भी...

ट्रूथ और कॉन्सिक्वेंसेस
ट्रूथ और कॉन्सिक्वेंसेस शहर का नाम एक रेडियो गेम शो के नाम पर रखा गया
यदि आपसे कोई आपके शहर का नाम पूछे और आप कहें- 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी,' या फिर 'कौन बनेगा करोड़पति' तो वो समझेगा आप उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं

बीबीसी के एलेक्शन बस से एरिज़ोना होते हुए हम न्यू मेक्सिको पहुँचे हैं और रुके हैं एक छोटे से शहर में, नाम है - ट्रूथ और कॉंन्सिक्वेंसेस (truth or consequences).

नाम सुनकर तो किसी किताब का नाम ज़ेहन में आता है.

लेकिन दरअसल हुआ ये कि वर्ष 1950 के आसपास एक रेडियो गेम शो के प्रस्तुतकर्ता ने कहा कि अगर कोई शहर उनके नए गेम शो 'ट्रूथ और कॉंन्सिक्वेंसेस' के नाम पर अपने शहर का नाम रख दे तो वो वहीं से अपना शो प्रस्तुत करेंगे.

अपने गर्म पानी के कुंओं और फ़व्वारों के लिए मशहूर इस शहर का उस समय नाम था - हॉट स्प्रिंग्स. लेकिन शहर ने अपना नाम बदल डाला और तभी से बन गया ट्रूथ और कॉंन्सिक्वेंसेस .

 ये शहर कई मायनों में कलाकारों, फ़नकारों का शहर है, लेकिन न्यू मेक्सिको राज्य की तरह ही डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकंस के बीच बँटा हुआ है

वही रेडियो शो फिर टेलीविज़न शो बन गया और काफ़ी चर्चा में रहा. लेकिन यहां के लोगों को इस नाम से परेशानी भी उठानी पड़ी.

शहर के पर्यटन विभाग की निर्देशक ज़ीना केली कहती हैं कि बहुत से लोग नाम सुनकर हंसने लग जाते हैं.

वे कहती हैं कि न्यू मेक्सिको के बाहर से कोई 'सेल्स कंपनी' जब फ़ोन करती है तो उन्हें इस शहर के नाम के साथ जुड़ी कहानी को समझाना पड़ता है.

वे कहती हैं कि इंटरनेट पर ख़रीदारी में भी दिक्कतें आती हैं.

बँटा हुआ शहर

ये शहर कई मायनों में कलाकारों, फ़नकारों का शहर है, लेकिन न्यू मेक्सिको राज्य की तरह ही डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकंस के बीच बँटा हुआ है.

बीबीसी ने जब वहाँ के कुछ लोगों को एक बहस के लिए इकठ्ठा किया तो इराक़ मामले, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को लेकर मतांतर साफ़ नज़र आ रहा था.

लेकिन डेमोक्रैट्स यानि बराक ओबामा के चाहने वाले ज़्यादा नज़र आए.

जब स्वास्थ्य का मामला उठा तो एक व्यक्ति का कहना था, "अपना ख़्याल ख़ुद रखो. सरकार से ही हर चीज़ की उम्मीद करोगे तो देश सोवियत रूस की तरह बन जाएगा."

मटमैली नदी
अमरीका में इन दिनों दुनिया की बदलती सच्चाई का सामना करने को लेकर बहस चल रही है

उनके यह कहने पर जवाब आया, "इराक़ पर इतना पैसा खर्च हो सकता है लेकिन अपने देश के लोगों की सेहत पर नहीं?"

लेकिन इन बड़े मामलों से ज़्यादा मतांतर साफ़ दिखता है रोज़मर्रा की ज़िंदगी की परेशानियों में.

शहर के बीच से गुज़रती एक मटमैली सी नदी के किनारे कुछ लोगों को मार्शल आर्ट 'ताई ची' सिखाती हुई मुझे मिलीं - एमी शेरोव.

उनका कहना था कि अमरीका के इन छोटे शहरों की परेशानियों को मज़हब और चर्च ने दरकिनार कर रखा है.

वे कहती हैं, "यहाँ कोई फ़ैमिली प्लानिंग क्लिनिक नहीं है, शादी से पहले बहुत ज़्यादा लड़कियां प्रेग्नेंट हो रही हैं यानी गर्भ धारण कर रही हैं. धर्म लोगों को अज्ञानता की तरफ़ ले जा रहा है."

वहीं दूसरी ओर यहां के एक चर्च के पैस्टर से जब मैं मिला तो उनका कहना था कि धर्म ही है जो परिवार को बांध कर रख रहा है.

रॉब व्हीलर ब्लैकस्टोन हॉट स्प्रिंग्स के नाम से एक होटल चलाते हैं जिसके कमरों को उन्होंने अमरीकी टीवी सीरियलों- ट्वाइलाइट ज़ोन, आइ लव लूसी, दी वर्ल्ड टर्न्स जैसे नाम दे रखे हैं.

सच्चाई का सामना

वे कहते हैं कि ये शहर कई मायनों में पूरे अमरीका का एक छोटा सा चेहरा है.

यहाँ डिजिटल आर्ट पर काम करने वाले रोय लोर कहते हैं कि उन्होंने इस शहर को इसलिए अपनाया क्योंकि ये याद दिलाता है कि या तो सच का सामना करो नहीं तो उसके नतीजे भुगतो.

दरअसल इन दिनों अमरीका में भी यही बहस चल रही है. बात हो रही है दुनिया की बदलती सच्चाई का सामना करने की.

बहुत लोगों की सोच है कि तेल की बढ़ती कीमतें, लुढ़कता शेयर बाज़ार हो, दीवालिया हो रहे बैंकों की बात हो, या फिर दुनिया के बदलते मौसम का ख़तरा हो, कहीं न कहीं अमरीका ने सच को नज़रअंदाज़ किया है जिसका नतीजा आज भुगतना पड़ रहा है.

जॉन मैक्केन और बराक ओबामा दोनों ही इन दिनों बदलाव के पैगाम पर ज़ोर दे रहे हैं. चुनाव में जो भी जीते देखने वाली बात होगी कि इस शहर का ये छोटा सा लेकिन अहम संदेश अमरीका गले लगाता है या नहीं.

(ब्रजेश उपाध्याय बीबीसी की उस विशेष बस पर सवार हैं जो राष्ट्रपति पद के चुनावों से पहले अमरीकियों की राय भांपने के लिए विभिन्न प्रांतों से गुज़र रही है)

ओबामा और हिलेरीराष्ट्रपति भवन की राह
पेंसिलवेनिया के नतीजे के बाद ओबामा और हिलेरी के बीच रेस जारी है.
ओबामा और हिलेर क्लिंटनहिलेरी का न्योता!
अमरीका में राष्ट्रपति उम्मीदवार धन उगाही के नए तरीक़े अपना रहे हैं.
ओबामागांधीजी से प्रभावित
गांधीजी से प्रभावित और प्रेरणा लेने वालों में बराक ओबामा का नाम भी शुमार.
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