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बर्मा के पीड़ितों के लिए अमरीकी सहायता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा में पहली बार अमरीकी सहायता के लिए अनुमति दी गई है. लेकिन राहत एजेंसियों का कहना है कि कि तबाही को देखते हुए सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं है. तूफ़ान की तबाही के नौ दिन बाद राहत सामग्री से लदा पहली अमरीकी विमान सोमवार को पड़ोसी देश थाइलैंड से बर्मा पहुँच रहा है. अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि सी-130 मालवाहक विमान पानी साफ़ करने के संयंत्र और दूषित पानी से उत्पन्न होनेवाली बीमारियों संबंधी दवाइयों को लेकर जा रहा है. थाइलैंड स्थिति अमरीकी सैनिक अड्डे पर इस उड़ान का प्रबंध संभाल रहे लेफ़्टिनेंट कर्नल डगलस पॉवेल ने कहा कि अमरीका तूफ़ान पीड़ितों की हरसंभव मदद करना चाहता है. उनका कहना था, '' थाइलैंड में 11 हज़ार अमरीकी सैनिक हैं. यहाँ हमारे पास राहत और बचाव अभियान चलाने के लिए हेलीकॉप्टर और छोटे-बड़े विमान समेत सभी ज़रूरी उपकरण हैं. मतलब हम बर्मा की जनता की हर तरह से सहायता करने में सक्षम हैं.'' अनुमति में आनाकानी अब ऐसा लगता है कि बर्मा की सरकार तूफ़ान पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आने वाली विदेशी सरकारों और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों से धीरे-धीरे ही सही सहयोग बढ़ा रही है. ब्रिटेन ने कहा है कि पहली बार उसके एक आपदा आकलन दल को बर्मा जाने की अनुमति मिली है. ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री डगलस अलेक्ज़ांडर ने बर्मा सरकार के रवैये में आ रहे बदलाव पर संतोष व्यक्त किया, लेकिन कहा कि अभी और क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है- उनका कहना था,'' बर्मा सरकार के अब तक के रवैये पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गहरी चिंता देखी जा रही थी, लेकिन अब पहले से ज़्यादा विमान राहत सामग्री के साथ रंगून पहुँच रहे हैं. इस बात के संकेत भी दिख रहे हैं कि ग़ैरसरकारी संगठनों को बर्मा के भीतर राहत कार्य चलाने की अनुमति दी जा सकती है. लेकिन सच कहें तो, इतना भर ही काफ़ी नहीं है.'' ग़ैरसरकारी राहत संस्था सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि उसके कुछ कार्यकर्ताओं को रंगून हवाईअड्डे से सहायता सामग्री लेकर तूफ़ान प्रभावित इलाक़ों में जाने दिया गया है. हालाँकि लगभग सारी सहायता संस्थाएँ यही चाहती हैं कि बर्मा में राहत कार्य चलाने पर किसी तरह का बाध्याकारी प्रतिबंध नहीं लगाया जाए. इन संस्थाओं का कहना है कि पर्याप्त संख्या में कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की मौजूदगी के बिना हर तूफ़ान पीड़ित तक सहायता नहीं पहुँचाई जा सकती है. सेव द चिल्ड्रन का कहना है कि राहत शिविरों में पीड़ितों के लिए जगह नहीं है. इन शिविरों में पर्याप्त संख्या में शौचालयों की व्यवस्था नहीं है. पर्याप्त मात्रा में पेयजल नहीं है. यहाँ तक कि बाल्टियों तक की कमी है. मौसम की चिंता मौसम की भविष्यवाणी को लेकर भी चिंता जताई जा रही है जिसमें इस सप्ताह के मध्य में भारी बारिश की बात कही गई है. कहीं मौसम विभाग का ये अनुमान सही निकला, तो बेघर तूफ़ान पीड़ितों के लिए, मुसीबत का नया दौर शुरू हो सकता है. कई इलाक़ों में अभी तक राहत शिविर नहीं लगाए जा सके हैं. ऐसे इलाक़ों में लोग अपने टूटेफूटे घरों के पास खुले में रह रहे हैं. कई दिनों से उनके पास खाने-पीने का सामान नहीं है. सिर पर छत नहीं है. ऐसे ही एक इलाक़े में कोई एक हज़ार तूफ़ान पीड़ितों की स्थिति में सुधार की उम्मीदें उस समय टूट गईं, जब उनके लिए तंबू और भोजन-पानी ला रही रेडक्रॉस की एक नौका डूब गई. इस नौका दुर्घटना में कोई हताहत तो नहीं हुआ, लेकिन बड़ी मात्रा में सहायता सामग्री पानी में समा गई. रविवार को बर्मा के सरकारी टीवी ने कहा कि तूफ़ान में 28,458 लोग मारे गए और 33,416 लोह लापता हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या एक लाख से ऊपर है. और यदि बर्मा सरकार ने अंतरराष्ट्रीय राहत प्रयासों में रोकटोक करना जारी रखा, तो मृतकों की संख्या कहीं ज़्यादा हो सकती है. |
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