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शुक्रवार, 20 जुलाई, 2007 को 02:12 GMT तक के समाचार
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बात आगे बढ़ी लेकिन समझौता अभी दूर
शिवशंकर मेनन और निकोलस बर्न्स
दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है
असैनिक परमाणु समझौते को अंतिम रुप देने के लिए वॉशिंगटन में हुई तीन दिनों की बातचीत के बाद भारत और अमरीका ने कहा है कि 'बात आगे बढ़ी है'.

लेकिन दोनों ही पक्षों ने कहा है कि इस मामले में अभी कुछ बाधाएँ बची हुई हैं और समझौता अभी कुछ दूर है.

दोनों देशों के बीच पिछले दो सालों में कई दौर की चर्चा हो चुकी है. गुरुवार को ख़त्म हुई चर्चा के बाद दोनों देशों ने कहा है कि समझौते को लेकर उम्मीदें बरकरार हैं.

दोनों देशों के बीच छोटे-मोटे मसलों के अलावा कम से कम दो ऐसे मुद्दे दिखते हैं जिन पर बात अटकी हुई है.

जिन दो मुद्दों पर असहमति है, उनमें से एक अमरीकी संसद की वह शर्त है जिसके अनुसार यदि भारत परमाणु परीक्षण करता है तो परमाणु ईंधन की आपूर्ति रोक दी जाएगी.

भारत इसके लिए राज़ी नहीं है और वह समझौते को इससे अलग रखते हुए परमाणु परीक्षण का अधिकार अपने पास रखना चाहता है.

एक दूसरी बाधा परमाणु ईंधन के फिर से उपयोग में लाए जाने के बारे में है. अमरीका चाहता है कि इसे अमरीका को वापस भेज दिया जाए, जबकि भारत इसका उपयोग ख़ुद करना चाहता है और अमरीका से तकनीकी सहयोग माँग रहा है.

अभी दिल्ली दूर

इस बातचीत में भारत का नेतृत्व सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने किया और उनके साथ विदेश सचिव शिवशंकर मेनन भी थे. जबकि अमरीकी दल का नेतृत्व विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने किया.

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार इस बातचीत के बाद निकोलस बर्न्स ने कहा, "हमने कई मुद्दों को सुलझाने में सफलता पाई है और अब हमें बस दो क़दम और चलना है."

कई दौर के बातचीत के बाद नतीजा नहीं निकलने की स्थिति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, "हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है और हम आशान्वित हैं कि कोई समझौता हो सकेगा."

 मुझे अचरज होगा अगर दोनों पक्षों में से कोई एक एकाएक कहे, यूरेका, हम समझौते पर पहुँच गए हैं
टॉम केसी, उपप्रवक्ता, विदेश मंत्रालय

दो दिनों की बातचीत को ज़्यादा स्पष्ट रुप से सामने रखा अमरीकी विदेश मंत्रालय के उपप्रवक्ता टॉम केसी ने. उन्होंने पत्रकारों से कहा, "मुझे नहीं लगता कि आज किसी घोषणा की उम्मीद करनी चाहिए."

बीबीसी हिंदी के अमरीका संवाददाता ब्रजेश उपाध्याय के अनुसार उन्होंने कहा, "मुझे अचरज होगा अगर दोनों पक्षों में से कोई एक एकाएक कहे, यूरेका, हम समझौते पर पहुँच गए हैं."

समाचार एजेंसी एएफ़पी ने अमरीकी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि दोनों पक्ष एक बड़ी बाधा को दूर करने में सफल हुए हैं. लेकिन इसके विवरण अधिकारियों ने अभी नहीं दिए हैं.

इस बातचीत के बीच भारतीय प्रतिनिधि मंडल की मुलाक़ात अमरीकी विदेश मंत्री कोंडालीसा राइस और उपराष्ट्रपति डिक चेनी से हुई है.

भारत के सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन की मुलाक़ात अमरीकी सुरक्षा सलाहकार स्टीफ़न हेडली से मुलाक़ात की है.

बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि इन महत्वपूर्ण राजनीतिक मुलाक़ातों से ज़ाहिर होता है कि समझौते को लेकर दोनों पक्ष अभी भी गंभीर हैं.

अहम समझौता

लंबी बातचीत के बाद मार्च 2006 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उन्होंने परमाणु सहमति पर हस्ताक्षर किए थे.

जॉर्ज बुश और मनमोहन सिंह
बुश चाहते हैं कि उनके कार्यकाल में ही हो जाए समझौता

इसके बाद अमरीकी संसद में क़ानून बदलने से लेकर भारत में चली गंभीर चर्चाओं का लंबा रास्ता भी तय किया गया है.

लेकिन अभी भी समझौता कुछ दूर दिखता है.

यदि दोनों पक्षों में सहमति बनती है तो इसे अमरीकी संसद की मंज़ूरी चाहिए होगी.

हालांकि भारत में इसकी कोई ज़रुरत नहीं होगी लेकिन भारत सरकार को परंपराओं के अनुरुप संसद को विश्वास में लेना होगा.

उल्लेखनीय है कि भारत और अमरीका के बीच जो परमाणु सहमति बनी है उसके अनुसार भारत को अमरीका से परमाणु ईंधन, रिएक्टर और तकनीक मिल सकेगा.

बदले में भारत को अपने सैन्य और असैनिक परमाणु ठिकानों को अलग-अलग करना होगा और अपने कई परमाणु संयंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों के लिए खोलना होगा.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इस परमाणु समझौते को अपनी विदेश नीति की एक बड़ी सफलता मानते हैं और चाहते हैं कि जनवरी 2009 में उनका कार्यकाल ख़त्म होने से पहले यह समझौता लागू हो जाए.

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