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भारत ने परमाणु शक्ति बनकर क्या पाया? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत, पाकिस्तान और इसराइल ने परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तख़त नही किए हैं लेकिन माना जाता है कि उनके पास परमाणु क्षमता है. भारत ने 1974 में अपना पहला शांति पूर्ण परीक्षण किया था और फिर मई 1998 में भी परमाणु परीक्षण किया. देखा-देखी पाकिस्तान में भी परमाणु परीक्षण किए थे. हालाँकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं लेकिन वो निरस्त्रीकरण का समर्थन करता है. तो फिर भारत ने परमाणु शक्ति संपन्न देशों की सूची में नाम लिखवा कर क्या खोया और क्या पाया? इस सवाल के जवाब के लिए बीबीसी हिंदी सेवा ने परमाणु मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर मतीन ज़ुबैरी से बात की तो उनका कहना था- भारत ने एक परमाणु ताक़त बनकर कुछ खोया नहीं बल्कि पाया ही है. 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद से दुनिया की बड़ी ताक़तों से भारत के रिश्ते बेहतर हुए हैं, हालाँकि शुरू में भारत पर अमरीका और जापान ने कुछ प्रतिबंध लगाए थे. लेकिन भारत को उनका कोई ख़ामियाज़ा नहीं भुगतना पड़ा, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से विकास की राह पर बढ़ रही थी और भारत की आर्थिक ताक़त को देखते हुए बाद में उस पर से प्रतिबंध भी हटा लिए गए.
अलबत्ता, 1974 में किए गए परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे उनसे उसके शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम पर बुरा असर पड़ा था. लेकिन हाल ही में अमरीकी विदेशमंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने भारत के शांति पूर्ण परमाणु कार्यक्रमों पर बातचीत की पेशकश की है, जो कि एक अच्छा संकेत है. किसी भी देश की ताक़त का अंदाज़ा उसकी सैन्य शक्ति और उसकी अर्थव्यवस्था से लगाया जाता है. जहाँ तक भारत की बात है, परमाणु परीक्षणों के बाद उसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ी है, और मुक्त अर्थव्यवस्था के इस दौर में दुनिया के बहुत से देश भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में देखते हैं, और इसी का भारत को फायदा मिला है. भारत ने चूँकि परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तख़त नहीं किए हैं लेकिन वह इस संधि का समर्थन करता है और ये चाहता है कि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोका जाए. लेकिन भारत यह भी चाहता है कि संधि का समर्थक होने के नाते उसे इसमें शामिल रखा जाए ताकि उसे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तमाल के फायदे मिल सकें. |
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