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सोमवार, 02 मई, 2005 को 14:36 GMT तक के समाचार
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परमाणु अप्रसार सम्मेलन में मतभेद
परमाणु हथियारों का विरोध
परमाणु अप्रसार संधि का मक़सद दुनिया में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना है लेकिन चार सप्ताह तक चलने वाले इस सम्मेलन के चर्चा बिंदुओं पर ही मतभेद उभरने लगे हैं.

अमरीका उत्तर कोरिया और ईरान के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की बात कह रहा है लेकिन बहुत से ग़ैर परमाणु देशों की दलील है कि अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन ने परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए कुछ नहीं किया है.

परमाणु हथियारों के विरोधियों का कहना है कि यदि परमाणु हथियारों को नष्ट नहीं किया गया तो धरती का नाश हो सकता है. इन हथियारों को हमेशा के लिए धरती से मिटा दिया जाए.

इन्हीं नारों और पोस्टरों के साथ लगभग चालीस हज़ार लोगों ने रविवार को नयूयॉर्क की सड़कों पर अपना विरोध प्रकट किया. इन्हीं में शामिल थे जापान के हिरोशिमा शहर के मेयर तादातोशी अकिएव.

तादातोशी अकिएव का कहना था, "हिरोशिमा और नागासाकी जैसी घटनाएँ दोबारा नहीं हों इसके लिए ज़रूरी है कि सभी परमाणु हथियार नष्ट कर दिए जाएँ. क्योंकि जबतक ये हथियार हैं तबतक उनके इस्तेमाल का ख़तरा बना रहेगा."

परमाणु अप्रसार संधि के तीन उद्देश्य हैं. पहला है परमाणु हथियारों का प्रसार बंद करना यानी ये सुनिश्चित करना कि जिन देशों के पास ये हथियार हैं वो दूसरों को नहीं दें.

इसका दूसरा लक्ष्य है निरस्त्रीकरण, जो ये सुनिश्चित करे कि सभी परमाणु हथियार नष्ट कर दिए जाएँ. और तीसरा उद्देश्य है परमाणु उर्जा के इस्तेमाल का अधिकार.

नोबूयासू एब संयुक्त राष्ट्र में निरस्त्रीकरण से जुड़े विभाग में अपर महासचिव हैं. उनका कहना है कि इस बैठक में ये तो तय है कि उन देशों के बीच विभाजित राय होगी जिनके पास परमाणु हथियार हैं और जिनके पास परमाणु हथियार नहीं हैं.

नोबूयासू एब का कहना था, "ज़ाहिर है कि मतभेद इस बात को लेकर होगा कि एक गुट कहेगा कि अप्रसार ज़्यादा महत्वपूर्ण है, दूसरे का मत होगा कि निरस्त्रीकरण का रास्ता ही सबसे बेहतर है. हम कह रहे हैं कि दोनों ही महत्वपूर्ण हैं दोनों पर ही बात हो."

मतभेद

अमरीका चाहता है कि उत्तर कोरिया जैसे देशों के मसले पर बहस हो. उत्तर कोरिया ने इस संधि से अपना नाम ये कहकर वापस ले लिया है कि उसके पास अब परमाणु हथियार हैं.

ग़ौरतलब है कि ख़बरें हैं कि रविवार को ही, यानी संधि पर होने वाले इस सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले, उत्तर कोरिया ने एक कम दूरी की मिसाइल का परीक्षण किया.

वहीं दूसरे देश परमाणु शक्तियों पर आरोप लगा रहे हैं कि वो निरस्त्रीकरण की ओर नहीं ध्यान दे रहे.

दूर हैं...
 परमाणु शक्तियाँ निरस्त्रीकरण करने के अपने वायदे से काफ़ी दूर हैं. ऐसे में अप्रसार संधि हज़ार ज़ख़्मों का शिकार होकर मौत की ओर बढ़ रही है.

शस्त्र नियंत्रण संगठन के निदेशक डेरिल किमबॉल का कहना है कि इस सम्मेलन के सामने कई चुनौतियाँ हैं, "एक तरफ़ उत्तर कोरिया का मामला है. दूसरी ओर ईरान परमाणु हथियारों में काम आनेवाली सामग्री बनाने के काफ़ी करीब है."

"परमाणु शक्तियाँ निरस्त्रीकरण करने के अपने वायदे से काफ़ी दूर हैं. ऐसे में अप्रसार संधि हज़ार ज़ख़्मों का शिकार होकर मौत की ओर बढ़ रही है."

संयुक्त राष्ट्र की परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख अल बारादेई का भी कहना है कि अप्रसार संधि में कई ख़ामियाँ हैं, "हम अजीब दुविधा में हैं. एक ओर तो ये संधि सभी देशों को परमाणु उर्जा के कार्यक्रमों की छूट देती है जिसका मतलब हुआ कि वो यूरेनियम संवर्धन के लिए कारख़ाने लगा सकते हैं और प्लूटोनियम को अलग किया जा सकता है."

"ये 1970 तक तो ठीक था जब हमें पता था कि किसी भी देश के लिए सबसे बड़ी बाधा है, इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाली तकनीक और उसके लिए ज़रूरी बुनियादी ढाँचा. लेकिन अब बुनियादी ढांचा बहुत देशों के पास है, और सबसे ज़्यादा अहमियत है हथियारों में काम आने वाली इस सामग्री की."

बीबीसी की संयुक्त राष्ट्र संवाददाता सुज़ाना प्राइस मानती हैं कि बैठक में भाग लेनेवाले देशों के बीच जिस तरह के मतभेद हैं उनसे तो यही लगता है कि इस बैठक से बहुत कुछ हासिल नहीं होने वाला है.

कई अन्य जानकारों का कहना है कि कई जटिल विवादों का हल इस संधि के बाहर है. जैसे ईरान के कार्यक्रम पर ईरान और यूरोपीय संघ की बातचीत, या फिर उत्तर कोरिया के मामले पर छह पक्षीय ढाँचा जो इस देश की परमाणु आकांक्षाओं पर विराम लगा सकता है.

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