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परमाणु समझौते पर बातचीत विफल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स और भारतीय विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के बीच असैनिक परमाणु समझौते पर ताज़ा बातचीत विफल हो गई है. दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर असहमति बरकरार है. इस समझौते के तहत भारत को अमरीका परमाणु इंधन की आपूर्ति करेगा लेकिन इसकी शर्तों को लेकर दोनों देशों में मतभेद कायम है. भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने का कहना था बातचीत 'निर्णायक' साबित नहीं हुई लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वार्ता में 'ठहराव' आ गया है. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच सहमति कायम होगी. भारत चाहता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बीच 18 जुलाई 2005 को बनी सहमति के तहत परमाणु इंधन की निर्बाध आपूर्ति की गारंटी को समझौते में शामिल रखा जाए लेकिन अमरीका इससे सहमत नहीं है. अमरीका का कहना है कि कुछ 'विशेष परिस्थितियों' इंधन आपूर्ति रोकी जा सकती है. अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स के साथ दो दिनों तक हुई चर्चा के बाद भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने शनिवार को कहा कि 123 समझौते से जुड़ी कई अड़चनों को दूर किया गया है. लेकिन उन्होंने माना कि अभी भी कुछ बाधाएँ बची हुई हैं. समझौते में देरी भारतीय विदेश सचिव का कहना था कि राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 18 जुलाई 2005 और फिर दो मार्च 2006 को जो संयुक्त बयान जारी किए थे और इसके बाद मनमोहन सिंह ने जो बयान दिए उन सभी पर भारत को क़ायम रहना है और इसीलिए इसमें समय लग रहा है.
उल्लेखनीय है कि भारत और अमरीका के बीच असैनिक परमाणु समझौता हो जाने के बाद अमरीका और दूसरे देश भारत को परमाणु ईंधन और तकनीक दे सकेंगे. जिसके आधार पर भारत परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर सकेगा. और भारत ने इसके बदले में अपने कुछ परमाणु संयंत्रों के निरीक्षण की इजाज़त देनी होगी. इसके लिए अमरीका ने अपने तीन दशक पुराने क़ानून में संशोधन किया है. लेकिन अब अमरीका की दो शर्तें हैं जो समझौते के रास्ते में आ रही हैं. एक तो यह कि अमरीका चाहता है कि भारत उपयोग किए हुए परमाणु ईंधन का दोबारा प्रयोग न करे और इसे अमरीका को लौटा दे. लेकिन भारत का कहना है कि वह परमाणु ईंधन के दोबारा प्रयोग का अधिकार अपने पास रखना चाहता है. और दूसरा बड़ी अड़चन यह है कि अमरीका चाहता है कि भारत अब परमाणु परीक्षण न करे और यदि वह परमाणु परीक्षण करता है तो उस स्थिति में अमरीका परमाणु ईंधन की आपूर्ति रोक देगा और भारत को दी हुई तकनीक वापस ले लेगा. भारत इसके लिए भी तैयार नहीं है और वह परमाणु परीक्षण का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहता है. क्या है 123 समझौता भारत के साथ असैनिक परमाणु समझौते को अमली जामा पहनाने के लिए जारी बातचीत में अक़्सर वन-टू-थ्री (123) समझौते का ज़िक़्र आता है. दरअसल इसका मतलब अमरीकी परमाणु ऊर्जा अधिनियिम (1954) की धारा 123 से है. इसमें प्रावधान है कि अमरीका को किसी भी देश के साथ परमाणु समझौता करने से पहले परस्पर सहयोग का दायरा तय करना होगा. दरअसल यह किसी भी देश के साथ परमाणु समझौता लागू करने की पूर्व शर्त है. विश्लेषकों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा क़ानून की इस धारा का इस्तेमाल करके अमरीका परोक्ष रूप से समग्र परमाणु परीक्षण निषेध समझौते (सीटीबीटी) की शर्तों को थोपने की कोशिश करता है. भारत के साथ जिन मुद्दों पर असहमति है, उसमें एक यह भी है कि अगर भारत परमाणु परीक्षण करता है तो अमरीका परमाणु इंधन की आपूर्ति के फ़ैसले की समीक्षा कर सकता है. रास्ता उधर बुश प्रशासन के सलाहकार अनुपम श्रीवास्तव ने बीबीसी को बताया कि अमरीका और भारत के बीच इन दोनों बड़ी अड़चनों को दूर करने के लिए रास्ता निकालने की कोशिशें शुरु हो गई हैं.
उनका कहना है कि परमाणु ईंधन के दोबारा उपयोग के लिए तो एक तरह से सहमति बन गई है. लेकिन इसके लिए अमरीका से जो तकनीक चाहिए उसका रास्ता साफ़ करने में काफ़ी समय लगेगा. परमाणु ईंधन के दोबारा उपयोग के लिए तकनीक के मसले पर उच्च स्तर पर नए सिरे से बात शुरु होगी. दूसरा मसला परमाणु परीक्षण का है. तो अनुपम श्रीवास्ताव का कहना है कि इसके लिए दोनों देशों ने एक समिति का गठन करने का फ़ैसला किया है जो इस मसले पर अगल से चर्चा करके कोई रास्ता निकालेगा. राइस आएँगी अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने शनिवार की सुबह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से औपचारिक मुलाक़ात की. इससे पहले शुक्रवार को उनकी मुलाक़ात विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी से हुई थी. जैसा कि शिवशंकर मेनन ने बताया प्रणव मुखर्जी ने अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस को भारत आने का न्यौता दिया है. मेनन का कहना है कि संभावना है कि आने वाले महीनों में राइस भारत आएँ. समझा जाता है कि राइस के भारत दौरे के दौरान ही परमाणु ईंधन के दोबारा उपयोग में लाने की तकनीक लेने-देने के बारे में बातचीत होगी. इसके अतिरिक्त समझौते की शेष अड़चनों को दूर करने की कोशिश की जाएगी. भारत के विदेश सचिव ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देश चाहते हैं कि यह समझौता जल्दी हो जाए. इस बीच छह से आठ जून के बीच जी-8 की बैठक के दौरान जर्मनी में मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश की मुलाक़ात होने की संभावना है. इस मुलाक़ात में भी कुछ अहम चर्चाएँ होंगी. लंबी यात्रा भारत और अमरीका के बीच असैनिक परमाणु समझौते का सूत्रपात 18 जुलाई 2005 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच बातचीत के बाद हुआ था. इसके बाद मार्च 2006 में जब राष्ट्रपति बुश भारत के दौरे पर आए तो इस सहमति को औपचारिक रुप दिया गया.
इस सहमति को भारत और अमरीका के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत होती रही. मई 2006 में लंदन में एक अहम बातचीत के बाद यह साफ़ हो गया था कि यह समझौता आसान नहीं है. लेकिन प्रगति होती रही और अमरीका ने आख़िर में समझौते का रास्ता बनाने वाले विधेयक को अंतिम रुप दे दिया. भारत के साथ असैनिक परमाणु समझौता करने के लिए अमरीका को अपने तीन दशक पुराने क़ानून में संशोधन करना था. आख़िर 27 जुलाई 2006 को अमरीकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 68 के मुक़ाबले 359 मतों से पारित कर दिया. इसके बाद इसे अमरीका के उच्च सदन में भेजा गया. नौ दिसंबर 2006 को सीनेट ने इसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया. इसके बाद औपचारिकता पूरी करते हुए 18 दिसंबर को विधेयक पर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने हस्ताक्षर कर दिए थे. | इससे जुड़ी ख़बरें अमरीका परमाणु समझौते के लिए अडिग01 जून, 2007 | भारत और पड़ोस बुश ने परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए18 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना भारत-अमरीका परमाणु समझौता मंज़ूर09 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना परमाणु सहमति प्रतिनिधि सभा में मंज़ूर27 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना अमरीकी उपराष्ट्रपति को मंज़ूरी की उम्मीद23 जून, 2006 | पहला पन्ना परमाणु सहमति के पक्ष में मुहिम तेज़14 जून, 2006 | पहला पन्ना भारत-अमरीका में परमाणु सहमति02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'परमाणु कार्यक्रम के साथ समझौता नहीं'03 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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