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'परमाणु कार्यक्रम के साथ समझौता नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष के इन आरोपों का खंडन किया है कि अमरीका के साथ हाल में ही हुई संधि से भारत ने परमाणु कार्यक्रम से साथ कोई समझौता किया है. उन्होंने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि भारत परमाण्विक सामरिक नीति के मामले में झुक गया है. वे अमरीका प्रवास के बाद सदन में दिए गए अपने बयान पर हो रही बहस का जवाब दे रहे थे. लोकसभा में इस बहस की शुरुआत करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत की परमाणु नीति में कथित बदलाव को लेकर चिंता जताते हुए कहा था कि सरकार को सभी को विश्वास में लेना चाहिए. इसके अलावा वामपंथी दलों के नेताओं ने आशंका जताई थी कि अमरीका अपने फ़ायदे के लिए भारत का उपयोग कर रहा है. प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया अब बहुध्रुवीय है और इसमें भारत किसी एक देश के लिए किसी एक देश के साथ ही रहना संभव नहीं है. इसके बाद उन्हें रुस और चीन के साथ हुए अपने समझौतों का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि अमरीका के साथ जो भी समझौता हुआ है उसका उद्देश्य भारत के विकास की गति को बढ़ाना है. उन्होंने कहा कि वे दो बातें स्पष्ट करना चाहते हैं, एक तो यह कि भारत के परमाण्विक सामरिक विकास में कोई बाधा नहीं आने वाली है और दूसरे इस समझौते का मुख्य उद्देश्य परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में पिछड़ गए भारत को वापस रास्ते पर लाना था. परमाणु उत्पादन के मामले में उन्होंने कहा कि इस संधि के बाद भी भारत को वही अधिकार हासिल रहेंगे जो दूसरे देशों को हासिल हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के मामले में प्रधानमंत्री सिंह ने कहा कि हालांकि इस मामले में अमरीका की राय दूसरी है लेकिन उन्हें आशा है कि भारत के दावे की अनदेखी नहीं की जाएगी. |
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