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बुधवार, 18 जुलाई, 2007 को 03:40 GMT तक के समाचार
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परमाणु समझौते पर बातचीत शुरु
शिवशंकर मेनन और निकोलस बर्न्स
शिवशंकर मेनन और निकोलस बर्न्स के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है
असैनिक परमाणु समझौते को अंतिम रुप देने के लिए अमरीका और भारत के बीच दो दिनों की बातचीत वॉशिंगटन में शुरु हो गई है.

अमरीका के विदेश मंत्रालय का मानना है कि हालांकि इस समझौते को लेकर कई महीनों से गतिरोध बना हुआ है लेकिन जल्दी ही समझौते की संभावना है.

इस बीच कम से कम दो ऐसे कठिन मुद्दे दिखते हैं जिनको सुलझाना ज़रूरी होगा.

जिन मुद्दों पर असहमति है, उनमें से एक अमरीकी संसद की वह शर्त है जिसके अनुसार यदि भारत परमाणु परीक्षण करता है तो परमाणु सहयोग रोक दिया जाएगा.

भारत इसके लिए राज़ी नहीं है और वह समझौते को इससे अलग रखते हुए परमाणु परीक्षण का अधिकार अपने पास रखना चाहता है.

एक दूसरी बाधा परमाणु ईंधन के फिर से उपयोग में लाए जाने के बारे में है. अमरीका चाहता है कि इसे अमरीका को वापस भेज दिया जाए, जबकि भारत इसका उपयोग ख़ुद करना चाहता है और अमरीका से तकनीकी सहयोग माँग रहा है.

बातचीत

इस बातचीत में भारत का नेतृत्व सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन कर रहे हैं जबकि अमरीकी दल का नेतृत्व विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स कर रहे हैं.

एमके नारायणन
नारायणन की मुलाक़ात अमरीकी सुरक्षा सलाहकार स्टीफ़न हेडली से भी होनी है

इसमें भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन भी उपस्थित रहेंगे.

बातचीत शुरु होने से पहले अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता श्याँ मैककॉर्मक ने कहा, "एक दो मसले हैं जिन्हें सुलझाना बचा हुआ है और हमें उम्मीद है कि हम उन्हें सुलझा लेंगे."

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार उन्होंने कहा कि इस बातचीत का उद्देश्य समझौते के क़रीब पहुँचना है और वे मानते हैं कि यह संभव है.

उधर भारतीय अधिकारियों ने भी इस बातचीत को लेकर उम्मीदें जताई हैं.

यदि दोनों पक्षों में सहमति बनती है तो इसे अमरीकी संसद की मंज़ूरी चाहिए होगी.

उल्लेखनीय है कि भारत और अमरीका के बीच जो परमाणु सहमति बनी है उसके अनुसार भारत को अमरीका से परमाणु ईंधन, रिएक्टर और तकनीक मिल सकेगा.

बदले में भारत को अपने सैन्य और असैनिक परमाणु ठिकानों को अलग-अलग करना होगा और अपने कई परमाणु संयंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों के लिए खोलना होगा.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इस परमाणु समझौते को अपनी विदेश नीति की एक बड़ी सफलता मानते हैं और चाहते हैं कि जनवरी 2009 में उनका कार्यकाल ख़त्म होने से पहले यह समझौता लागू हो जाए.

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