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शनिवार, 09 सितंबर, 2006 को 14:17 GMT तक के समाचार
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आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग दिशाहीन हुई

जॉर्ज बुश
11 सितंबर की घटना के बाद आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान हुआ था
ग्यारह सितंबर की घटना के तुरंत बाद अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने 'आंतकवाद के विरुद्ध युद्ध' का ऐलान किया था, जो शुरू में स्पष्ट था और इसे काफ़ी समर्थन भी मिला.

लेकिन इस घटना के पाँच साल बाद यह रास्ता भटक चुका हैं.

9/11 के एक दिन बाद ला मोंडे ने लिखा था, "अब हम सब अमरीकी हैं." लेकिन हाल में लंदन में प्रदर्शन के दौरान एक तख़्ती पर लिखा था, "अब हम सब हिज़्बुल्ला हैं."

अमरीकी नीतियाँ शुरू में सफल रहीं. अफ़ग़ानिस्तान में तत्काल युद्ध से तालेबान की कमर टूट गई और अल- क़ायदा के प्रशिक्षण कैंप बंद हो गए, जो सफलता के लिए ज़रूरी था.

अल-क़ायदा के बहुत नेता मारे गए. इसके बावजूद पूरी दुनिया ख़ासकर पश्चिमी देशों के लोग दहशत में थे और यह वाजिब भी था.

इसका असर या सहानुभूति सिर्फ न्यूयार्क और वॉशिंगटन में ही नहीं बाली, मैड्रिड, लंदन, मोरक्को, इस्तांबुल और अन्य जगहों पर भी दिखा.

9/11 के बाद का डर ही बुश की आक्रमक नीति का कारण बनी. लेकिन सबने इसे स्वीकार नहीं किया.

अमेरिका के सहयोगी शंका और मतभेद के चलते बँट चुके हैं. बहुत से लोग जिनके मन में अमरीका के लिए सहानुभूति थी, अब शंका में बदल चुकी है और कुछ तो नफ़रत करने लगे हैं.

ग्वांतानामो बे और अबू ग़रेब जेल, क़ैदियों की स्थिति, गुप्त जेलों और क़ैदियों के स्थानांतरण में प्रयोग में लाने जाने वाले गुप्त उड़ानों ने नफरत की इस भावना को बढ़ाने का काम किया है.

बुश की हाल की घोषणाओं से गुप्त जेलों को ख़ाली करने और दूसरे उपायों से कुछ शंकाओं का ही निदान हुआ है. संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में इसका क्या प्रभाव पड़ता है इसका आकलन अभी किया जाना है.

विफल रणनीति

लंदन के किंग्स कॉलेज के प्रोफ़ेसर माइकल क्लार्क कहते हैं कि कम-से-कम अभी तो स्थितियां धुंधली हैं. वे कहते हैं, "अगर मैं ओसामा बिन लादेन होता तो अपनी गुफ़ा में बैठा ख़ुद को विजेता महसूस कर रहा होता."

इसकी वजहें गिनाते हुए क्लार्क कहते हैं कि लादेन कमोबेश पूरी दुनिया में यात्रा करने में सक्षम है, सभी जगह के युवा मुस्लिमों से इच्छानुसार संवाद कर पा रहे हैं, कई लोग उनसे प्रेरणा ले रहे हैं और उन्होंने अमरीका को इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के रूप में अपने पसंद के क्षेत्र में और अपने तरीक़े से युद्ध लड़ने के लिए विवश कर दिया.

अमरीकी नीतियों पर इराक़ की छाया पूरी दुनिया को स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है. इसका कारण यह है कि बहुत सारी सरकारें और लोग इराक़ को आतंकवाद के समाधान के रूप में नहीं बल्कि समस्या के रूप में देखते हैं.

ऐसा नहीं है कि इराक़ पर आक्रमण की वजह से अल-क़ायदा की आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा मिला. 11 सितंबर के हमले इराक़ युद्ध के पहले ही हो चुके थे.

हाल में तो जर्मनी की ट्रेन को निशाना बनाने का प्रयास किया गया, जबकि जर्मनी ने इराक़ पर हमले का विरोध किया था.

लेकिन इतना ज़रूर है कि अभी जो शंका का माहौल दिख रहा है, उसके लिए इराक़ अकेले सबसे बड़ी वजह है.

इराक़ नीति

अमरीका का कहना है कि इराक़ में जीत ज़रूरी है नहीं तो आंतकवाद के विरुद्ध युद्ध में हार हो जाएगी. हालाँकि बहुत से विरोधी ये तो मानते हैं कि इराक़ में जीत ज़रूरी है लेकिन उनका कहना है कि इस घोषणा से स्थिति बिगड़ी है.

इराक़ में स्थितियाँ बद से बदतर हुई हैं

बुश प्रशासन की मुश्किल ये है कि इराक़ पर हमले के समय तो उसने व्यापक विनाश के हथियारों होने की बात कही थी और बाद में सुर बदल लिए.

इराक़ पर अमरीका ने अपनी नीतियों को किस तरह बदला है यह इराक़ पर हमले के पहले और बाद में राष्ट्रपति बुश के बयानों से पता चलता है.

इस साल 31 अगस्त को अमरीकी सेनाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "यह लड़ाई लंबी चलेगी, पर हम इसे ज़रूर जीतेंगे. यह सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि 21 वीं शताब्दी की निर्णायक वैचारिक लड़ाई है."

बुश का अपने बयान में भविष्य काल का प्रयोग करना युद्ध के पहले दिए गए बयान के उलट है.
26 फरवरी 2003 को उन्होंने कहा था कि हम जीत रहे हैं और हत्यारों को चुन-चुन कर ढूँढ़ रहे हैं.

प्रोफ़ेसर क्लार्क कहते हैं, "पश्चिमी देशों की नीतियाँ अंत में विजयी रहेंगी क्योंकि यह राजनीतिक, नैतिक और आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प है."

उन्हें पश्चिम की नीतियों में बेहतर विकल्प नज़र आ रहा है. लेकिन इसमें काफ़ी लंबा समय लग सकता है.

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